Friday, December 30, 2011

इन घुमावदार चौराहों ने


इन घुमावदार चौराहों ने 
धूल के थमने पर डामर बिछना,
बारिशों से डामर उखड़ना,
गिट्टियों को धंसाकर
फिर से  डामर बिछाने के प्रयत्न,
 अनेक बार देखे हैं ...

देखा है,
झुर्रियों में बदलती कसावट को 
खामोशियों में पैदा हुई आहट को,
एक तरफ भटकाव 
तो दूसरी तरफ 
पंथ मिलने से मिली राहत को,
इन घुमावदार चौराहों ने...

पर वहां देखो..
..कोई खड़ा है..
ओह ..एक जिज्ञासु..
गूँज रहे हैं कुछ शब्द,
खामोशी  में ...

पथिक हो
जानना है जितना  
उतना तो जान ही लोगे 
प्रयत्न उस से अधिक के लिए 
संभवतः व्यर्थ है!

Friday, June 3, 2011

चाँद में दाग़ ??

चाँद में जो दिखता है
वह खरगोश है छोटा सा 
संशय है उसके रंग पर 
किन्तु वह दौड़ता है,
उछलता है ,
कूदता है ,
कल्पना के साम्राज्य में...

जहाँ न कोई तख्त है 
ना कोई ताज..
उसको तो बस सुनाई पड़ती है
एक आवाज़..

जिसके  स्रोत को खोजने की अपेक्षा 
वह आभारी है ,
उन कानो का ,
जिन में पड़ रही है
वह आवाज़!

Sunday, April 3, 2011

मुस्कुराहट

इस कागज़ में दबे हुए 
सूखे फूलों की पंखुड़ियां 
मुस्कुरा रही हैं
बस यूँ हीं,

उनको जलन नहीं है 
उन फूलों से 
जिनकी ताजगी और ख्शुबू 
हिस्सा है 
किसी गुलदस्ते का ,

ये तो पेड़ पर थीं 
जब तक सूख नहीं गयीं ,
और सूखने के बाद 
मुलाक़ात हो जाती है इनकी 
उस कलम से
जो दौड़ रही है 
इस कागज़ पर 
और खुश हो जाती हैं 
उस स्पर्श से /

Tuesday, March 22, 2011

उसकी दुनिया में

बनी रहती थी चहल कदमी
उसकी हवेली में ,
वह बात करती थी उनसे 
उसके बारे में 
जो सो रहा था बेफिक्र 
उसके पलंग पर,

गूंजती रहती थी
उसके कानों में 
पैंजनियां के घुंघुरू की झंकार 
तब भी 
जब शांत हो जाती थी 
दूसरों के लिए  /

पैंजनियां उतरी तो 
हाथी, चीते , भालू , गाडी , गुडिया ,
बन गए 
उसकी भी दुनिया के हिस्से ,

साथ चली 
जहाँ तक वह चल सकती थी
और धीरे-धीरे 
बनने लगी एक दूसरी दुनिया .......

इस नज़र का उधर देखना काफी है 
आँखें चार हो जाने के लिए
और तब 
कहती है 
फैली हुई मुस्कराहट 
कि
पहने हुए पैंजनियां 
वह सोता है उसके पलंग पर बेफिक्र ,
आज भी /


Monday, March 14, 2011

वह लहर

अक्षरों को 
सहम सहम कर आते देख,
सोचा कि रात को 
बुला लूँगा इन्हें ...


अभी 
सुन्दर दिखने को व्याकुल है 
इस चट्टान से टकरा रहा पानी ..

सामने का नज़ारा ...वाह
मधुर संगीत ..वाह 
ठंडी हवाएं ...वाह
होठों के बीच 
लगी आग ...वाह 

...आह..वो बीच में उठी सफ़ेद लहर ...
..आह ..एक बार फिर से उठी ...
कितनी सुन्दर थी वह लहर ..
...ऐसा कह रहे हैं 
खुशी खुशी आते 
अक्षर भी .../



Friday, March 11, 2011

यूँ घूमो मत 
इधर उधर 
किसी का ध्यान 
भंग कर रही है 
आप के पैरों की आहट,

क्या ?
मैं तो चुपचाप बैठा हूँ 
कुछ कह नहीं रहा ,

नहीं ...
तुम्हारा चुपचाप बैठना 
अनुमति दे रहा है 
तुम्हारे मस्तिष्क को 
मेरी लीची तक पहुँचने
और फिर उसे खाने की ,

तो तुम मुझे दे क्यूँ नहीं देते 
कुछ लीची के फल 
ले सकते हो 
आम जितने भी चाहिए ,

देखो मैं तुम्हे निराश नहीं करता 
यदि 
बात केवल 
पेट की होती /

प्रिल्यूड

बांसुरी बजाते हुए 
पीछे खड़े नीम से 
आगे खड़े आम तक 
सफ़र तय कर लिया 
शहतूत से बात करते हुए 
पवन ने /

नीम पर उसका जन्म हुआ
आम पर अंत 
यौवन शहतूत पर बीता ,
कहना कठिन है 
बिन प्रमाण के /

पवन का व्यवहार 
या विचार की सैर 
उपयुक्त  विकल्प हैं,
किसी प्रिल्यूड
या घटना की अपेक्षा /    

कॉफ़ी पीते हुए

क्रांति चौक?,
विश्वविद्यालय का वह केंद्र 
जिसे पैर एवं पहिये ही जानते हैं..

और उस दिन 
आँखों और कानों की सहमति से 
स्थापित हो रहा था 
केंद्र के रूप में 
जिस दिन 
स्टीफेंस 
करोड़ीमल 
रामजस 
सी एल सी से 
आ रहीं 
मिश्रित
आकर्षक  
किंतु चिरपरिचित 
आवाजों ने,
.......गाडी 
रिक्शा 
और कुछ 
परिचित सायों ने, 
पाया उसको  
मित्रों के साथ 
बात करते हुए,
जिसने 
पकड़ लिया 
एक 
हष्ट-पुष्ट दिखता 
विचार / 

अब उसे
कॉफ़ी पीते हुए 
बात करना
अच्छा लगता है 
उस विचार से 
जो पकड़ा था उसने 
क्रांति चौक पर / 

Thursday, March 10, 2011

कल रात

कल रात पूर्णिमा थी ,
चाँद सोने का हुआ 
चांदी का हुआ, 
नाचने लगा 
प्रकाश 
उस सुसज्जित पार्क के 
अनदेखे कोने में 
पडी हुई कुर्सी के 
चारों ओर
जहाँ हलचल थी बंद आँखों की, 
आँखें कम खुलीं 
पर चेहरा खिल गया /

रौशनी जाने लगी 
गहरी होने लगी छाँव और अँधेरे की दोस्ती, 
कम होने लगे विकल्प 
उन अधखुली आँखों के सामने,

आँखों के और शरीर के 
आलसी संघर्ष का अंत किया 
उस ठंडी हवा के झोके ने ,
कान भी बोलने लगे कि 
यह पूर्णिमा है पतझड़ की /

चहुँ ओर फैला धवल प्रकाश 
उड़ते पत्तों का महारास,
अर्धसुसुप्त घास 
जिसको जगा दें ओष की बूँदें 
ऐसी आस,
यह सब देखा उस कुर्सी ने 
कल रात /


आज प्रतिपदा है /




Sunday, March 6, 2011

बूँदें


प्रतीक्षा बहुत करनी पडी
अनगिनत लेखनियों को 
भरे हुए तालाब में 
मेघ से चार बूँदें 
टपकने की,

बूँदें टपकने लगीं 
लेखनियाँ दौड़ने लगीं,

देखो यह एक झरना है 
जोड़ रहा है धरती और आकाश को,
प्यासी धरती को देख 
रोने लगा आकाश,
बहती हुई अश्रुधारा 
परिलक्षित है झरने के रूप में ,
अंततः समझ ही ली 
धरती की बैचैनी 
बादल ने /

देखो यह पीली मिट्टी है 
उग आये हैं इस पर
नित्य बढ़ते गोखुरू ,
बूंदों से मिलेगा 
इनको बढ़ावा
परन्तु कुछ पलों में 
बिखरेगी सौंधी खुसुबू ,
अंततः समझ ही ली 
नाक की बेचैनी 
धरती ने /

देखो यह एक यौवन है 
तड़प रहा है जल बिन मछली की भाँति
अभीप्सा, आकांक्षा ,कल्पनाओं की ज्योति 
बसी हुई है उसके नैनों में ,
जामुन के बाग़ में 
सावन के झूलों पर 
झूल रही है तड़प ,
अंततः समझ ही ली 
यौवन की बेचैनी 
प्रीतम ने /

देखो यह एक चूड़ी है 
जिसका 
हो रहा है तालाब में 
जल की सतह पर 
प्रतिपल विस्तार, 

बूँदें बढीं 
चूड़ियाँ भी बढीं,
कुछ लेखनियाँ
जो अब तक बैठी थीं चुपचाप 
चल पडीं,
देखो यह एक चूड़ी है 
जो काट रही है 
दूसरी चूड़ी को ,
देखो यह...  ...कट रही है 
दूसरी से ,
देखो ये...काट रही हैं 
एक दूसरे को ,
देखो ये .. काट या कट नहीं रहीं 
विलीन हो रही हैं 
एक दूसरे में 
जल की सतह पर ही ,
अंततः समझ ही ली 
चूड़ियों की बेचैनी 
बूंदों  ने /

देखो यह मैं हूँ 
जो खोज नहीं रही 
कुछ भी नया ,
उगल रही हूँ कागज़ पर 
वही जो देख रही हूँ ,
यह नया है ना ,
उस दृष्टि के लिए लिए 
जो इधर नहीं पडी,

अंततः समझ ही ली 
इस कलम की बेचैनी 
इन हाथों ने / 

Sunday, February 27, 2011

क्या बरगद से वह डरता है?

इतना बड़ा बरगद,
किसी विशालकाय दैत्य सी उसकी छाँव ,
तना और उस से निकलती टहनियां ,
उन टहनियों से निकलते वो सांप ,
उलटे तो लटक रहे हैं ऐसे ..
मानो डस लेंगे इस ज़मीन को ही ...

परिंदा तो गया है डर,
पर डरता रहेगा उम्र भर ..
कहना थोड़ी जल्दबाजी होगी .

धारा के उस ओर उसे देखने दो,
पर क्या यह बबूल ही मिली थी उसे बैठने को ?
दो पल बीते बबूल पर,
पंख पड़ गया शूल पर ,
उड़ा थोड़ा सा ऊपर,
घायल पंखों पर झूल कर ,
दिखा उसे वही बरगद ,
कालिंदी के कूल पर ...

इस बार उसे डर नहीं लगा,
जा बैठा दोनों पंख हिला ,
पंखों को भी आराम मिला ,
जो भय था ..अब हो दूर चला ,
दो शाखाओं के बीच उसे ,
जाने कैसा आनंद मिला ,
अप्रतिम यह रैन बसेरा है ..
आ रहा नवीन सवेरा है ..
लो क्षितिज पुनः अब लाल हुआ 
वह तिमिर काल का गाल हुआ ..
कल-कल कालिंदी करती है ,
लो रश्मि सतह से मिलती है ..
स्वर्णिम स्वर्णिम कालिंदी तट ,
जीवित होने को है पनघट ..
वह पंछी जाग पडा झटपट ...

नभ के आधीन स्वयं को कर,
कोसों पीछे छोड़ा है डर ,
स्वच्छंद उड़ानों में अपनी..
नित नयी ताजगी भरता है, 
अब पूछो तो उसको जाकर ..
क्या बरगद से वह डरता है ?



Wednesday, February 16, 2011

वह शिला


(photograph-:nakki lake 2008)

यूँ कुछ दूर दूर ..
क्षितज के पास कुछ दिखाई दिया ,
लगता था कि कोई जहाज है ..
दूर इतना था कि,
अवनी और अम्बर का मिलन देखने का प्रयत्न धूमिल हो रहा 
दृष्टिगोचर होता था ,
प्रतिबिम्ब  भी आशान्वित था ,
क्षणभर दृष्टिगोचर हो जाने हेतु , 
भाव निश्छलता की प्रतिमूर्ति के रूप में
स्थापित कर रहे थे स्वयं को ही.
सूर्यास्त की लालिमा आने का साहस नहीं रखती थी ,
मेरी आँख एवं क्षितिज पर स्थित लक्ष्य के मध्य ..

अतः दिखने लगा लाल साये से ढका
उस पश्चिमी छोर पर 
प्रकृति का कूट्नीतियुक्त पराक्रम ...

फिर हुआ ..पराक्रम से पराक्रम का मिलन ,
एक नूतन  क्रम ...
अब अंत में क्रमशः लिखना भी 
प्रतीत होने लगा है अनुचित ..

दुविधायान में बैठा हुआ 
विचार इस बात पर कर रहा हूँ  कि 
क्या है उचित ..
पीछे घूम कर देखना ..?
स्वयं के ही प्रतिबिम्ब पर दया करना ?
या फिर जहाज को देखना ?

ये सब मैं तब सोच रहा था  ..
जब मेरी  आँखें पश्चिमी छोर पर फ़ैली हुई लाली को निहार रही थीं..

"बात यहीं खत्म नहीं हुई ...
सूर्यास्त हुआ ...
लालिमा गयी 
जहाज था भी या नहीं ..पता नहीं 
जो यहाँ बैठा हुआ ..
देख रहा था इन सब को ,
चला गया उठ कर अपने घर ..
स्थापित होने लगा निशा का साम्राज्य ....
और संवारने लगी मैं स्वयं को ...
क्यूँ कि मैं भी एक कविता हूँ
जिसे उषा-निशा की भेंट में 
रूचि नहीं है छटांक भर भी 
क्यूँ कि कवि प्रतिदिन यहीं आता है 
इसी शिला पर समय बिताता है 
मेरे प्रतिपल परिवर्तित होते स्वरुप को निहारता है ..
जितना महत्त्वपूर्ण यह है कि
कभी किंकर्तव्यविमूडित होकर 
कभी रोते 
कभी हंसते 
कभी गाते हुए जाता है ...
उतना ही महत्त्वपूर्ण यह है कि वह आता है  "

Tuesday, February 8, 2011

wave particle duality !



तुमको देखा तो एक ख्याल आया
तुमको देख रहा था तो ख्याल से बात नहीं की..

ख्याल का क्या है ..
अपनी मर्ज़ी से आता है अपनी मर्ज़ी से जाता है ..
ख्यालों के लिए कोई सरहद नहीं होती ..
उनके लिए ना कुछ इस पार ना कुछ उस पार .
ठीक है ...सरहद तो ख्यालों के लिए नहीं होती..
पर सियासत उनके साथ जरूर खेलती है ..
..
सियासत तो अपने आप में एक खेल है ..
आज दुश्मनी तो कल मेल है ..
मेल कि बात कर के जन्म ना दो एक नए ख्याल को ..
क्यूँ कि ये तो कभी ना रुकने वाली रेल है 
रेल गाडी मेल हो या पैसेंगेर 
जाना तो हम दोनों को दिल्ली  है ..
स्टेशन वही रहेगा ...कुली शायद उतना ही लेगा 
राही तुम पारस नहीं हो ..
तो ये लोहे की रेल सोना नहीं बनेगी ..
सोना बनाने कि गलती भी मत करना ...
क्यूँ कि तुमको अगले स्टेशन पर उतर जाना है 

राही तुम्हारा सफ़र रुक जाएगा ....
गाडी भी सोने की हो गयी तो रस्ते मैं हि लुट जायेगी 
और वैसे भी सोने कि पटरी पर गाडी नहीं दौड़ पाएगी...
व्यर्थ ही  तेरी लंका लुट जायेगी ! 

(eddy n sukhi)

Monday, February 7, 2011

सूर्योदय से पहले


पूर्णिमा का चाँद,.
कुछ घने साये.
पहली बारिश से उठी सौंधी खुशबू ,
कहीं दूर चीखते सियारों कि आवाजें,
आधी रात में खेत जोतता किसान..
उसके बैलों के गले में बज रही घण्टियाँ,
बहते पानी की वो आवाज़
दो कदम पर ठहराव और फिर उस पानी में पड़ता
अर्धरात्रि के पूर्ण विकसित चन्द्र का प्रतिबिम्ब ..
अचानक से कान पर झींगुर का दहाड़ना ,
और फिर वो कंपकंपी,
जिसको और बढ़ा दिया बबलू कि भूत कथा ने ,
जिसमे इस बरगद से उस पीपल तक भूत क़ी बारात गयी थी ...

जूतियों क़ी चर्रचर्र एकमात्र संगीत,
जो अमावस को भी सुनाई दिया था,
..तो क्या बंधुवर हर रात....?
....
सन्नाटे में कोस भर दूर से कानों कि तरफ भागता सन्नाटा ,
जिस से कुछ कोस और दूर पड़ता है वह गाँव...

यहाँ तक आ तो जाता हूँ ..पर आगे नहीं बढ़ पता हूँ ..
क्यों ..?
क्यूंकि सूर्योदय हो जाएगा तब तक ...और बन जायेगी दूसरी ..
पर .. नहीं रह पाएगी ये कविता ...
इसीलिए हाँ , मैं हर रात यहाँ आता हूँ
सूर्योदय से पहले उलटे पांव चला जाता हूँ...
कोई पूछे तो
भूत मिल गया था
ऐसा बहाना बनाता हूँ !

Sunday, February 6, 2011

? बहाने का ...

चले जाना संभव नहीं रौशनी का,
ये तो बस फर्क है ना देख पाने का ...
संभलना तो बचपन से सीखा है.
अभी जो डर है .वो है बहक जाने का ..
ये बहकना भी कोई नया नहीं है जी ..
यहाँ तो अनुभव है ज़माने का
अब ये कम्बख्त जो आ गया है
इसको बड़ा शौक है बहाने का ..

अब आ तो गया है ना ..
रहने दो कुछ दिन
वक़्त खुद आ जाएगा
उसके जाने का..
नहीं गया तो भी कोई बात नहीं ..
व्यापार खोल लेगा समझाने का ...

वहां पर तो सफल नहीं होगा..
दे देंगे उसको छोटा सा कमरा तहखाने का ..
"कैदी नहीं हो भाई..
कहीं भी आ-जा सकते हो"
उसको बोल देंगे ..
शुकून है कि वह ग़ुलाम नहीं होगा ..
किसी बहाने का ..

Saturday, February 5, 2011

लाल रबर की बॉल

हां हाँ ..दस मिनट चाहिए ना ?
दिए ..
अब निकलकर जलाना जरुरी था..
वो चबूतरा..और अचानक वो दिख गया..
हाथ मैं बल्ला था...और हरी कच्च घास में
उसके पेट को चीर कर
आसमान कि ओर रुख कर कर के खड़े वो तीन डंडे..
बल्ला उसके हाथ मैं था ..
सवाल उसके दिमाग में ..
कि वह इन डंडों को बचाए या फिर बॉल को उडाये..
उसने सोचा चलो यार बॉल पर ध्यान लगाते हैं.
और जैसे हि वह रबर कि लाल बॉल आयी,
उसने बल्ला उठाया ..और बॉल रोड के दूसरी पार ..
वह पिछले आधा घंटे से बॉल को खोज रहा है..
नहीं वह बॉल को खोज नहीं रहा
वह तो पिछले आधा घंटे से सोच रहा है कि ...
बॉल आखिर खो कैसे गयी..
..."ओये बॉल कु छोड़ ..तेरी मैया बुलाई रई ऐ तोकू "...
अरे अब तो प्यारी मैया के पास जाना ही पड़ेगा ..
और हाँ ..
मैया से पैसा ले के नयी बॉल भी ले आऊंगा..
मैया ने पैसे दिए ..
बॉल आयी
खेल फिर शुरू हुआ...
पर अभी भी उसको लगता है ...
कि काश मिल जाती
उसकी वो लाल रबर कि बॉल!
...
अरे अभी पांच मिनट हि हुए हैं ....

Friday, February 4, 2011

कवि पगला चुका है ?

धर्मं ..लिखा जा चुका है ,
अर्थ ..जी
काम ...जी
मोक्ष ..जी
और इन चारो के अलावा ?
..बहुत कुछ .
और जो मुझे चाहिए ?
..मिलेगा

जब इतना सब लिखा जा चुका है ,
फिर भी लिखते जा रहा है ,
क्या कवि पगला चुका है?

..ये कैसा सवाल है हुजुर .
पहले
ये तो बताओ .
कि तुमको
चाहिये
क्या?
.

Thursday, February 3, 2011

अबे ग्यारह बज गए

एकटक उनको ना देखो गौर से,
आज उनके पास भी कुछ काम है .
मस्त चंदा, खुशी रैना ,
खिलखिलाती शाम है .

सुबह का आनंद यूँ,
लेते रहो
कोयलों की चहक में ,
खोते रहो
और किरणे गुदगुदा दें आपको
सुबह की, ये सोच खुश होते रहो .
शाम के बारे में सोचो मत सखे ,
शाम तो आगे बहुत ही दूर है
नींद आ जाएगी तुझको शाम तक,
क्यूँ कि तू तो आदतन मजबूर है .

दोपहर तक का सफ़र तो नाप ले..
शाम होगा क्या? अभी से भांप ले
फायदा क्या व्यर्थ मैं जगता रहे
सुबह की कोयल सुबह फिर ना मिले ?

सोच अब मुझको जकड़ना छोड़ दो
रुख स्वयं का अंत ही अब मोड़ लो
क्यूँ कि
ये सिलसिला है कि टूटने का नाम नहीं लेता,
मैं तब भी नहीं सोता था, और मैं अब भी नहीं सोता ..

मैं आज कल इतना हूँ सोता..
सपने मैं ही हँसता हूँ और सपने मैं ही रोता..
आज कल तो सपने में समुद्र तट जाने लगा हूँ..
सपने में ही सोता और सपने में ही खाने लगा हूँ..
और तो और सपने में ही एक नयी,
दुनिया बनाने लगा हूँ ..
पर वहां रहता कौन है..
नित्च्ज़े या अरविन्द ?
बांसुरी या गिटार ?
अंकल सैम या केसरिया मैम?
स्ट्रॉबेरी या टमाटर ?
स्पीडमैन या G5 ?
क्या फर्क पड़ता है
सपना ही तो है ..
ऐसे मत नकारो उसको
आखिर वो भी अपना ही तो है ..
वाह वाह .. क्या खूब फरमाया है ..
हमको बुद्धू बनाने आया है ..
हाथी खम्बे जैसा नही होता है ..
हमको बताने आया है...
भाई आज शाम को मुझे बहुत काम है..
वैसे मैं भूल गया..तेरा क्या नाम है?
खैर छोड़ ...
अगली बार लिखवा लूँगा ...
और हाँ तेरी जरूरत पडी तो बता दूंगा ...

ठक ठक ..ठक ठक ..
अबे ..ग्यारह बज गए ..मुझे स्कूल जाना है ...
हाँ हाँ कोई बात नहीं ..इस सैटरडे को दोनों साथ चलेंगे !

Tuesday, January 25, 2011

मेरा दिमाग क्यूँ खा रहा है

तो तुम ये कहना चाहते हो ..
रास्ता वही है जो तुम्हारे लिए रास्ता है ..
और वही रास्ता इस दुनिया के लिए है..
यहाँ लोग सत्ता के लिए
कर रहे हैं
खून पे खून ,
किसी को है अहिंसावादी
बनने का जुनून,
कोई रोटी बना रहा है ,
कोई खा रहा है ,
कोई खिला रहा है ,
और कोई ,जिनके पास रोटी नहीं है ..
उनको रोटी दिखा रहा है ,
कोई अपनी फटी पतलून को देख के शरमा रहा है.
और हाँ ..
हाँ ..
वो देखो कोई
मजदूरों पर गाडी चढ़ा रहा है ..
कोई उनको बचा रहा है
किसको ?..
अरे भाई कोई मजदूर को ,
तो कोई गाडी वाले को..

क्या ?..
क्या..
तेरी समझ मैं कुछ भी नहीं आ रहा है ...
:हाँ भाई मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है .....
तो खुद देख,
बाहर निकल कर,
अपने अंधकारमय ,
राजमहल से ..

मेरा दिमाग क्यूँ खा रहा है...

छाती मैं दर्द था कल

हाँ नही था कोई ...
जिसने कहा हो मुझसे ...
कि करो इस तरह से ..
या इस तरह से नहीं ..

था जानता नहीं मैं ,
कब तक कहूँगा खुद से ,
चुनता रहा हमेशा,
उपलब्ध थे जो मुझको,
विचार कुछ अनोखे /

अब होश आ रहा है ,
हाँ ..नशा हट रहा है ...
होता गया यूं ही...
अब कष्ट दे रहा है..
ना ....
ये कष्ट तो नहीं है ..
अनुभूति है अलग सी,
अनुभूति कहूं इसको ..
या नशा कुछ अलग सा

वो दोष खुद को दे तो,
तौहीन है हमारी
छाती मैं दर्द था कल
अब तक वो चल रहा है.
विचार एक नूतन
चुपके निकल रहा है/

उस दर्द के सहारे,
उस दर्द के सहारे..

Monday, January 24, 2011

कौन बनेगा करोडपती

और उस एक सवाल ने
कर दिया चिंतित मुझे,
क्या दोष दूँ .
उस सवाल करने वाले को ?
या उस माध्यम को
जिसकी वजह से सवाल पैदा हुआ है ..
या फिर स्वयं को,
उस माध्यम से जुड़ा होने के लिए ?
सवाल करने वाले को ,
या फिर उसके उस माध्यम से जुड़े होने को ?

दोष चिंता का भी हो सकता है जो अचानक से टूट पडी /

"उसको हटा दो,
खुद हट जाओ ,
या फिर माध्यम ही नही रहने दो ......"
ऐसे कुछ विकल्प आये तो थे

तो महोदय ये कोई खेल भी नहीं है ..
कौन बनेगा करोडपती का...
कि इनाम एक सही उत्तर पर मिलेगा...
अपना तो बीमा भी नहीं है /

सवाल चारों दिशाओं में
घूम रहे हैं
ग्रहों की तरह ...
जवाबों की रोशनी
उन पर पड़ कर दिन और रात का भेद पैदा कर रही है ...

तो सूर्य पूर्व में निकलता है ....यह एक जवाब है ..?

Friday, January 21, 2011

वो हल्की रेशमी ...


ये झोंपड़ी सावन में
सामना नहीं करती
ऊपर से आ रहे पानी का ..

जाड़ा और गरमी भी तो झांक कर जाते हैं उसके घर ,
जब भी उन को मौका मिलता है .

पर आज ना कुहरा है ..
ना पानी बरस रहा है ,
सुबह की हल्की रेशमी किरण आ रही है उसकी बिछावन पर ...
फटे हुए छप्पर कि अनुमति से ..

औ फिर बैठ गयी सिरहाने ...बोली..
यही समय है ..
उनको घर बुलाने का ...
फिर क्या था ...
लाल मिट्टी ..परात भर
और गोबर...
चौका हुआ ..खाना बना
और होने लगा इंतज़ार ....

वो आये या नहीं इसको छोडिये

पर आज उनके लिए ये सब हुआ..बस ये सोचिये ..
ऐसा नहीं है कि इंतज़ार पहले नहीं हुआ ...
सावन कि टपकती बूंदों , सर्दी मैं ठिठुरते कम्बल से पूछो ...

तो फिर आज क्या ख़ास था ?
..आज ?..
आज वो सुबह की हल्की रेशमी किरण...
गलती उसी की है ...

Thursday, January 20, 2011

जल रहे हैं

चलना तो पड़ा हमें..
अब भी चल रहे हैं
कहीं आशा के दीप ..
तोह कहीं दिल जल रहे हैं ....

इनको तो जलना ही था ..
सो जल पड़े ...
ज़माने को जाके बताये कोई ...
कि इन से ज्यादा तो हम जल रहे हैं ....

ये हवाओं के झोकों को ,
समझाओ भाई ...
आज कुछ ज्यादा ही ..
झूमे चल रहे हैं ...

बताओ इन्हें ,थी अभी आग बाकी...
आने से इनके सुलगने लगे हैं ...

"यूँ सुलगा के जाओ ना ..
जाना है तो आओ ना .."

ऐसा कभी भी मैं कह ना सकूँगा ..
हवा के झोके हो ,
जानता हूँ ...
तो फिर क्यूँ कहूँगा...
..
कैसे रहेंगे तुम बिन अभ्यास कर रहे हैं...
अभ्यास मैं हमारे क्यूँ आप जल रहे हैं?...

आभास हो गया और अभी हो गया है ...
आभास है तुम्हारा, अनुभूति है तुम्हारी,

अनुभूति के सहारे अब राह चल रहे हैं ,
ना तुम जल रहे हो , ना हम जल रहे हैं./

Tuesday, January 18, 2011

सवाल मुझ से मत करो


मेरे जाने के बाद क्या मिलेगा उस जगह पर,
सवाल ये मुझ से नहीं उस जगह से करना./
अगर कुछ ना मिले वहां पर तो
फिर ये हाल ज़माने से मत कहना /

क्यूँ कि मुझे तो भय नहीं है ज़माने का,
नहीं मुझे शौक है किसी बहाने का /

फंसा देंगे तुमको ,ये लोग निर्दयी हैं..
ये बात दूसरी है , ये गलत या सही हैं /
हो तुम भी वहीं और हम भी वहीं हैं .....

फिर ...फिर ...

ये बात मेरे जाने की कैसे उठी है ..
अब उठ तो गयी ...
चाहे जैसे उठी है...
... सवाल ये मुझ से नहीं उस जगह से करना.

क्यूँ कि हम भी वहीं हैं और तुम भी वहीं हो ...
पर हम दोनों ...
वहां नहीं हैं ..
जहां पहले थे ....

पहले हम कहाँ थे ...सवाल ये मुझ से नहीं उस जगह से करना....

Monday, January 17, 2011

भ्रम या वास्तविकता

ये राहें कहीं भ्रम तो नहीं ,
ये आहें कहीं भ्रम तो नहीं ,
ये बाहें भी कहीं भ्रम तो नहीं ?

या फिर सच यही हैं ,
भ्रम लगता है क्यूँ कि मैं भ्रम में हूँ /

पर ये भ्रम क्या चीज है जी ?

जला दूँ सबको तो जलेगा क्या,
भ्रम या वास्तविकता?
पर यह तो...
वास्तविकता के जलने के बाद भी,
नहीं पता चलेगा ...
क्यूँ कि भ्रम तब भी बचा रहेगा...

तो अब क्या ?
क्या सत्ता सापेक्षता की है..
यदि हाँ तो भ्रम और वास्तविकता हैं कहाँ ?

दूर ..दूर ...दूर .... सापेक्ष हि सापेक्ष है....
न भ्रम , न वास्तविकता ....