पूर्णिमा का चाँद,.
कुछ घने साये.
पहली बारिश से उठी सौंधी खुशबू ,
कहीं दूर चीखते सियारों कि आवाजें,
आधी रात में खेत जोतता किसान..
उसके बैलों के गले में बज रही घण्टियाँ,
बहते पानी की वो आवाज़
दो कदम पर ठहराव और फिर उस पानी में पड़ता
अर्धरात्रि के पूर्ण विकसित चन्द्र का प्रतिबिम्ब ..
अचानक से कान पर झींगुर का दहाड़ना ,
और फिर वो कंपकंपी,
जिसको और बढ़ा दिया बबलू कि भूत कथा ने ,
जिसमे इस बरगद से उस पीपल तक भूत क़ी बारात गयी थी ...
जूतियों क़ी चर्रचर्र एकमात्र संगीत,
जो अमावस को भी सुनाई दिया था,
..तो क्या बंधुवर हर रात....?
....
सन्नाटे में कोस भर दूर से कानों कि तरफ भागता सन्नाटा ,
जिस से कुछ कोस और दूर पड़ता है वह गाँव...
यहाँ तक आ तो जाता हूँ ..पर आगे नहीं बढ़ पता हूँ ..
क्यों ..?
क्यूंकि सूर्योदय हो जाएगा तब तक ...और बन जायेगी दूसरी ..
पर .. नहीं रह पाएगी ये कविता ...
इसीलिए हाँ , मैं हर रात यहाँ आता हूँ
सूर्योदय से पहले उलटे पांव चला जाता हूँ...
कोई पूछे तो
भूत मिल गया था
ऐसा बहाना बनाता हूँ !
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