Thursday, January 20, 2011

जल रहे हैं

चलना तो पड़ा हमें..
अब भी चल रहे हैं
कहीं आशा के दीप ..
तोह कहीं दिल जल रहे हैं ....

इनको तो जलना ही था ..
सो जल पड़े ...
ज़माने को जाके बताये कोई ...
कि इन से ज्यादा तो हम जल रहे हैं ....

ये हवाओं के झोकों को ,
समझाओ भाई ...
आज कुछ ज्यादा ही ..
झूमे चल रहे हैं ...

बताओ इन्हें ,थी अभी आग बाकी...
आने से इनके सुलगने लगे हैं ...

"यूँ सुलगा के जाओ ना ..
जाना है तो आओ ना .."

ऐसा कभी भी मैं कह ना सकूँगा ..
हवा के झोके हो ,
जानता हूँ ...
तो फिर क्यूँ कहूँगा...
..
कैसे रहेंगे तुम बिन अभ्यास कर रहे हैं...
अभ्यास मैं हमारे क्यूँ आप जल रहे हैं?...

आभास हो गया और अभी हो गया है ...
आभास है तुम्हारा, अनुभूति है तुम्हारी,

अनुभूति के सहारे अब राह चल रहे हैं ,
ना तुम जल रहे हो , ना हम जल रहे हैं./

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