चले जाना संभव नहीं रौशनी का,
ये तो बस फर्क है ना देख पाने का ...
संभलना तो बचपन से सीखा है.
अभी जो डर है .वो है बहक जाने का ..
ये बहकना भी कोई नया नहीं है जी ..
यहाँ तो अनुभव है ज़माने का
अब ये कम्बख्त जो आ गया है
इसको बड़ा शौक है बहाने का ..
अब आ तो गया है ना ..
रहने दो कुछ दिन
वक़्त खुद आ जाएगा
उसके जाने का..
नहीं गया तो भी कोई बात नहीं ..
व्यापार खोल लेगा समझाने का ...
वहां पर तो सफल नहीं होगा..
दे देंगे उसको छोटा सा कमरा तहखाने का ..
"कैदी नहीं हो भाई..
कहीं भी आ-जा सकते हो"
उसको बोल देंगे ..
शुकून है कि वह ग़ुलाम नहीं होगा ..
किसी बहाने का ..
No comments:
Post a Comment