ये झोंपड़ी सावन में
सामना नहीं करती
ऊपर से आ रहे पानी का ..
जाड़ा और गरमी भी तो झांक कर जाते हैं उसके घर ,
जब भी उन को मौका मिलता है .
पर आज ना कुहरा है ..
ना पानी बरस रहा है ,
सुबह की हल्की रेशमी किरण आ रही है उसकी बिछावन पर ...
फटे हुए छप्पर कि अनुमति से ..
औ फिर बैठ गयी सिरहाने ...बोली..
यही समय है ..
उनको घर बुलाने का ...
फिर क्या था ...
लाल मिट्टी ..परात भर
और गोबर...
चौका हुआ ..खाना बना
और होने लगा इंतज़ार ....
वो आये या नहीं इसको छोडिये
पर आज उनके लिए ये सब हुआ..बस ये सोचिये ..
ऐसा नहीं है कि इंतज़ार पहले नहीं हुआ ...
सावन कि टपकती बूंदों , सर्दी मैं ठिठुरते कम्बल से पूछो ...
तो फिर आज क्या ख़ास था ?
..आज ?..
आज वो सुबह की हल्की रेशमी किरण...
गलती उसी की है ...
nice..
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