प्रतीक्षा बहुत करनी पडी
अनगिनत लेखनियों को
भरे हुए तालाब में
मेघ से चार बूँदें
टपकने की,
बूँदें टपकने लगीं
लेखनियाँ दौड़ने लगीं,
देखो यह एक झरना है
जोड़ रहा है धरती और आकाश को,
प्यासी धरती को देख
रोने लगा आकाश,
बहती हुई अश्रुधारा
परिलक्षित है झरने के रूप में ,
अंततः समझ ही ली
धरती की बैचैनी
बादल ने /
देखो यह पीली मिट्टी है
उग आये हैं इस पर
नित्य बढ़ते गोखुरू ,
बूंदों से मिलेगा
इनको बढ़ावा
परन्तु कुछ पलों में
बिखरेगी सौंधी खुसुबू ,
अंततः समझ ही ली
नाक की बेचैनी
धरती ने /
देखो यह एक यौवन है
तड़प रहा है जल बिन मछली की भाँति
अभीप्सा, आकांक्षा ,कल्पनाओं की ज्योति
बसी हुई है उसके नैनों में ,
जामुन के बाग़ में
सावन के झूलों पर
झूल रही है तड़प ,
अंततः समझ ही ली
यौवन की बेचैनी
प्रीतम ने /
देखो यह एक चूड़ी है
जिसका
हो रहा है तालाब में
जल की सतह पर
प्रतिपल विस्तार,
बूँदें बढीं
चूड़ियाँ भी बढीं,
कुछ लेखनियाँ
जो अब तक बैठी थीं चुपचाप
चल पडीं,
देखो यह एक चूड़ी है
जो काट रही है
दूसरी चूड़ी को ,
देखो यह... ...कट रही है
दूसरी से ,
देखो ये...काट रही हैं
एक दूसरे को ,
देखो ये .. काट या कट नहीं रहीं
विलीन हो रही हैं
एक दूसरे में
जल की सतह पर ही ,
अंततः समझ ही ली
चूड़ियों की बेचैनी
बूंदों ने /
देखो यह मैं हूँ
जो खोज नहीं रही
कुछ भी नया ,
उगल रही हूँ कागज़ पर
वही जो देख रही हूँ ,
यह नया है ना ,
उस दृष्टि के लिए लिए
जो इधर नहीं पडी,
अंततः समझ ही ली
इस कलम की बेचैनी
इन हाथों ने /
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