हां हाँ ..दस मिनट चाहिए ना ?
दिए ..
अब निकलकर जलाना जरुरी था..
वो चबूतरा..और अचानक वो दिख गया..
हाथ मैं बल्ला था...और हरी कच्च घास में
उसके पेट को चीर कर
आसमान कि ओर रुख कर कर के खड़े वो तीन डंडे..
बल्ला उसके हाथ मैं था ..
सवाल उसके दिमाग में ..
कि वह इन डंडों को बचाए या फिर बॉल को उडाये..
उसने सोचा चलो यार बॉल पर ध्यान लगाते हैं.
और जैसे हि वह रबर कि लाल बॉल आयी,
उसने बल्ला उठाया ..और बॉल रोड के दूसरी पार ..
वह पिछले आधा घंटे से बॉल को खोज रहा है..
नहीं वह बॉल को खोज नहीं रहा
वह तो पिछले आधा घंटे से सोच रहा है कि ...
बॉल आखिर खो कैसे गयी..
..."ओये बॉल कु छोड़ ..तेरी मैया बुलाई रई ऐ तोकू "...
अरे अब तो प्यारी मैया के पास जाना ही पड़ेगा ..
और हाँ ..
मैया से पैसा ले के नयी बॉल भी ले आऊंगा..
मैया ने पैसे दिए ..
बॉल आयी
खेल फिर शुरू हुआ...
पर अभी भी उसको लगता है ...
कि काश मिल जाती
उसकी वो लाल रबर कि बॉल!
...
अरे अभी पांच मिनट हि हुए हैं ....
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