Sunday, September 24, 2017

मुंसिफ़

मुझे आज़ाद करने में तू खुद को तोड़ता क्यूँ है;
मेरी तासीर तो तेरे लहू में रच बसी है। 

यूँ कर के क़ैद, मेलों में मुझे फिर ढूंढ़ता है;
बता ऐ पीर कैसी ये तेरी चारागरी है।  

मेरे होने से मालिक तू अगर होता कज़ा का;
तू ज़िंदा रह मेरे मुंसिफ़, कज़ा तो चल बसी है।  

हमारे हाल पर ये पिघलना है कहक़शाँ का;
न छू शबनम को उसमें, यूँ कि, गरमाहट बची है।  

-------------------------------------------------------------------------------------


तासीर-Effect/impression
क़ज़ा-Death
चारागर -Doctor
मुंसिफ़ - Judge
कहक़शाँ -Galaxy
शबनम -  Dew


1 comment: