Wednesday, February 16, 2011

वह शिला


(photograph-:nakki lake 2008)

यूँ कुछ दूर दूर ..
क्षितज के पास कुछ दिखाई दिया ,
लगता था कि कोई जहाज है ..
दूर इतना था कि,
अवनी और अम्बर का मिलन देखने का प्रयत्न धूमिल हो रहा 
दृष्टिगोचर होता था ,
प्रतिबिम्ब  भी आशान्वित था ,
क्षणभर दृष्टिगोचर हो जाने हेतु , 
भाव निश्छलता की प्रतिमूर्ति के रूप में
स्थापित कर रहे थे स्वयं को ही.
सूर्यास्त की लालिमा आने का साहस नहीं रखती थी ,
मेरी आँख एवं क्षितिज पर स्थित लक्ष्य के मध्य ..

अतः दिखने लगा लाल साये से ढका
उस पश्चिमी छोर पर 
प्रकृति का कूट्नीतियुक्त पराक्रम ...

फिर हुआ ..पराक्रम से पराक्रम का मिलन ,
एक नूतन  क्रम ...
अब अंत में क्रमशः लिखना भी 
प्रतीत होने लगा है अनुचित ..

दुविधायान में बैठा हुआ 
विचार इस बात पर कर रहा हूँ  कि 
क्या है उचित ..
पीछे घूम कर देखना ..?
स्वयं के ही प्रतिबिम्ब पर दया करना ?
या फिर जहाज को देखना ?

ये सब मैं तब सोच रहा था  ..
जब मेरी  आँखें पश्चिमी छोर पर फ़ैली हुई लाली को निहार रही थीं..

"बात यहीं खत्म नहीं हुई ...
सूर्यास्त हुआ ...
लालिमा गयी 
जहाज था भी या नहीं ..पता नहीं 
जो यहाँ बैठा हुआ ..
देख रहा था इन सब को ,
चला गया उठ कर अपने घर ..
स्थापित होने लगा निशा का साम्राज्य ....
और संवारने लगी मैं स्वयं को ...
क्यूँ कि मैं भी एक कविता हूँ
जिसे उषा-निशा की भेंट में 
रूचि नहीं है छटांक भर भी 
क्यूँ कि कवि प्रतिदिन यहीं आता है 
इसी शिला पर समय बिताता है 
मेरे प्रतिपल परिवर्तित होते स्वरुप को निहारता है ..
जितना महत्त्वपूर्ण यह है कि
कभी किंकर्तव्यविमूडित होकर 
कभी रोते 
कभी हंसते 
कभी गाते हुए जाता है ...
उतना ही महत्त्वपूर्ण यह है कि वह आता है  "

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