इतना बड़ा बरगद,
किसी विशालकाय दैत्य सी उसकी छाँव ,
तना और उस से निकलती टहनियां ,
उन टहनियों से निकलते वो सांप ,
उलटे तो लटक रहे हैं ऐसे ..
मानो डस लेंगे इस ज़मीन को ही ...
परिंदा तो गया है डर,
पर डरता रहेगा उम्र भर ..
कहना थोड़ी जल्दबाजी होगी .
धारा के उस ओर उसे देखने दो,
पर क्या यह बबूल ही मिली थी उसे बैठने को ?
दो पल बीते बबूल पर,
पंख पड़ गया शूल पर ,
उड़ा थोड़ा सा ऊपर,
घायल पंखों पर झूल कर ,
दिखा उसे वही बरगद ,
कालिंदी के कूल पर ...
इस बार उसे डर नहीं लगा,
जा बैठा दोनों पंख हिला ,
पंखों को भी आराम मिला ,
जो भय था ..अब हो दूर चला ,
दो शाखाओं के बीच उसे ,
जाने कैसा आनंद मिला ,
अप्रतिम यह रैन बसेरा है ..
आ रहा नवीन सवेरा है ..
लो क्षितिज पुनः अब लाल हुआ
वह तिमिर काल का गाल हुआ ..
कल-कल कालिंदी करती है ,
लो रश्मि सतह से मिलती है ..
स्वर्णिम स्वर्णिम कालिंदी तट ,
जीवित होने को है पनघट ..
वह पंछी जाग पडा झटपट ...
नभ के आधीन स्वयं को कर,
कोसों पीछे छोड़ा है डर ,
स्वच्छंद उड़ानों में अपनी..
नित नयी ताजगी भरता है,
अब पूछो तो उसको जाकर ..
क्या बरगद से वह डरता है ?
good one..very nice..
ReplyDeletereally man..gud going....its wonderful....i think it shows hw neccessity changes ur views...m i right????
ReplyDeletenecessity of living life ravi...
ReplyDeleteइस नए सुंदर से चिट्ठे के साथ आपका हिंदी ब्लॉग जगत में स्वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!
ReplyDelete" भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" की तरफ से आप को तथा आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामना. यहाँ भी आयें, यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो फालोवर अवश्य बने .साथ ही अपने सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ . हमारा पता है ... www.upkhabar.in
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