Sunday, February 27, 2011

क्या बरगद से वह डरता है?

इतना बड़ा बरगद,
किसी विशालकाय दैत्य सी उसकी छाँव ,
तना और उस से निकलती टहनियां ,
उन टहनियों से निकलते वो सांप ,
उलटे तो लटक रहे हैं ऐसे ..
मानो डस लेंगे इस ज़मीन को ही ...

परिंदा तो गया है डर,
पर डरता रहेगा उम्र भर ..
कहना थोड़ी जल्दबाजी होगी .

धारा के उस ओर उसे देखने दो,
पर क्या यह बबूल ही मिली थी उसे बैठने को ?
दो पल बीते बबूल पर,
पंख पड़ गया शूल पर ,
उड़ा थोड़ा सा ऊपर,
घायल पंखों पर झूल कर ,
दिखा उसे वही बरगद ,
कालिंदी के कूल पर ...

इस बार उसे डर नहीं लगा,
जा बैठा दोनों पंख हिला ,
पंखों को भी आराम मिला ,
जो भय था ..अब हो दूर चला ,
दो शाखाओं के बीच उसे ,
जाने कैसा आनंद मिला ,
अप्रतिम यह रैन बसेरा है ..
आ रहा नवीन सवेरा है ..
लो क्षितिज पुनः अब लाल हुआ 
वह तिमिर काल का गाल हुआ ..
कल-कल कालिंदी करती है ,
लो रश्मि सतह से मिलती है ..
स्वर्णिम स्वर्णिम कालिंदी तट ,
जीवित होने को है पनघट ..
वह पंछी जाग पडा झटपट ...

नभ के आधीन स्वयं को कर,
कोसों पीछे छोड़ा है डर ,
स्वच्छंद उड़ानों में अपनी..
नित नयी ताजगी भरता है, 
अब पूछो तो उसको जाकर ..
क्या बरगद से वह डरता है ?



5 comments:

  1. really man..gud going....its wonderful....i think it shows hw neccessity changes ur views...m i right????

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  2. necessity of living life ravi...

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  3. इस नए सुंदर से चिट्ठे के साथ आपका हिंदी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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