बनी रहती थी चहल कदमी
उसकी हवेली में ,
वह बात करती थी उनसे
उसके बारे में
जो सो रहा था बेफिक्र
उसके पलंग पर,
गूंजती रहती थी
उसके कानों में
पैंजनियां के घुंघुरू की झंकार
तब भी
जब शांत हो जाती थी
दूसरों के लिए /
पैंजनियां उतरी तो
हाथी, चीते , भालू , गाडी , गुडिया ,
बन गए
उसकी भी दुनिया के हिस्से ,
साथ चली
जहाँ तक वह चल सकती थी
और धीरे-धीरे
बनने लगी एक दूसरी दुनिया .......
इस नज़र का उधर देखना काफी है
आँखें चार हो जाने के लिए
और तब
कहती है
फैली हुई मुस्कराहट
कि
पहने हुए पैंजनियां
वह सोता है उसके पलंग पर बेफिक्र ,
आज भी /