Tuesday, March 22, 2011

उसकी दुनिया में

बनी रहती थी चहल कदमी
उसकी हवेली में ,
वह बात करती थी उनसे 
उसके बारे में 
जो सो रहा था बेफिक्र 
उसके पलंग पर,

गूंजती रहती थी
उसके कानों में 
पैंजनियां के घुंघुरू की झंकार 
तब भी 
जब शांत हो जाती थी 
दूसरों के लिए  /

पैंजनियां उतरी तो 
हाथी, चीते , भालू , गाडी , गुडिया ,
बन गए 
उसकी भी दुनिया के हिस्से ,

साथ चली 
जहाँ तक वह चल सकती थी
और धीरे-धीरे 
बनने लगी एक दूसरी दुनिया .......

इस नज़र का उधर देखना काफी है 
आँखें चार हो जाने के लिए
और तब 
कहती है 
फैली हुई मुस्कराहट 
कि
पहने हुए पैंजनियां 
वह सोता है उसके पलंग पर बेफिक्र ,
आज भी /


Monday, March 14, 2011

वह लहर

अक्षरों को 
सहम सहम कर आते देख,
सोचा कि रात को 
बुला लूँगा इन्हें ...


अभी 
सुन्दर दिखने को व्याकुल है 
इस चट्टान से टकरा रहा पानी ..

सामने का नज़ारा ...वाह
मधुर संगीत ..वाह 
ठंडी हवाएं ...वाह
होठों के बीच 
लगी आग ...वाह 

...आह..वो बीच में उठी सफ़ेद लहर ...
..आह ..एक बार फिर से उठी ...
कितनी सुन्दर थी वह लहर ..
...ऐसा कह रहे हैं 
खुशी खुशी आते 
अक्षर भी .../



Friday, March 11, 2011

यूँ घूमो मत 
इधर उधर 
किसी का ध्यान 
भंग कर रही है 
आप के पैरों की आहट,

क्या ?
मैं तो चुपचाप बैठा हूँ 
कुछ कह नहीं रहा ,

नहीं ...
तुम्हारा चुपचाप बैठना 
अनुमति दे रहा है 
तुम्हारे मस्तिष्क को 
मेरी लीची तक पहुँचने
और फिर उसे खाने की ,

तो तुम मुझे दे क्यूँ नहीं देते 
कुछ लीची के फल 
ले सकते हो 
आम जितने भी चाहिए ,

देखो मैं तुम्हे निराश नहीं करता 
यदि 
बात केवल 
पेट की होती /

प्रिल्यूड

बांसुरी बजाते हुए 
पीछे खड़े नीम से 
आगे खड़े आम तक 
सफ़र तय कर लिया 
शहतूत से बात करते हुए 
पवन ने /

नीम पर उसका जन्म हुआ
आम पर अंत 
यौवन शहतूत पर बीता ,
कहना कठिन है 
बिन प्रमाण के /

पवन का व्यवहार 
या विचार की सैर 
उपयुक्त  विकल्प हैं,
किसी प्रिल्यूड
या घटना की अपेक्षा /    

कॉफ़ी पीते हुए

क्रांति चौक?,
विश्वविद्यालय का वह केंद्र 
जिसे पैर एवं पहिये ही जानते हैं..

और उस दिन 
आँखों और कानों की सहमति से 
स्थापित हो रहा था 
केंद्र के रूप में 
जिस दिन 
स्टीफेंस 
करोड़ीमल 
रामजस 
सी एल सी से 
आ रहीं 
मिश्रित
आकर्षक  
किंतु चिरपरिचित 
आवाजों ने,
.......गाडी 
रिक्शा 
और कुछ 
परिचित सायों ने, 
पाया उसको  
मित्रों के साथ 
बात करते हुए,
जिसने 
पकड़ लिया 
एक 
हष्ट-पुष्ट दिखता 
विचार / 

अब उसे
कॉफ़ी पीते हुए 
बात करना
अच्छा लगता है 
उस विचार से 
जो पकड़ा था उसने 
क्रांति चौक पर / 

Thursday, March 10, 2011

कल रात

कल रात पूर्णिमा थी ,
चाँद सोने का हुआ 
चांदी का हुआ, 
नाचने लगा 
प्रकाश 
उस सुसज्जित पार्क के 
अनदेखे कोने में 
पडी हुई कुर्सी के 
चारों ओर
जहाँ हलचल थी बंद आँखों की, 
आँखें कम खुलीं 
पर चेहरा खिल गया /

रौशनी जाने लगी 
गहरी होने लगी छाँव और अँधेरे की दोस्ती, 
कम होने लगे विकल्प 
उन अधखुली आँखों के सामने,

आँखों के और शरीर के 
आलसी संघर्ष का अंत किया 
उस ठंडी हवा के झोके ने ,
कान भी बोलने लगे कि 
यह पूर्णिमा है पतझड़ की /

चहुँ ओर फैला धवल प्रकाश 
उड़ते पत्तों का महारास,
अर्धसुसुप्त घास 
जिसको जगा दें ओष की बूँदें 
ऐसी आस,
यह सब देखा उस कुर्सी ने 
कल रात /


आज प्रतिपदा है /




Sunday, March 6, 2011

बूँदें


प्रतीक्षा बहुत करनी पडी
अनगिनत लेखनियों को 
भरे हुए तालाब में 
मेघ से चार बूँदें 
टपकने की,

बूँदें टपकने लगीं 
लेखनियाँ दौड़ने लगीं,

देखो यह एक झरना है 
जोड़ रहा है धरती और आकाश को,
प्यासी धरती को देख 
रोने लगा आकाश,
बहती हुई अश्रुधारा 
परिलक्षित है झरने के रूप में ,
अंततः समझ ही ली 
धरती की बैचैनी 
बादल ने /

देखो यह पीली मिट्टी है 
उग आये हैं इस पर
नित्य बढ़ते गोखुरू ,
बूंदों से मिलेगा 
इनको बढ़ावा
परन्तु कुछ पलों में 
बिखरेगी सौंधी खुसुबू ,
अंततः समझ ही ली 
नाक की बेचैनी 
धरती ने /

देखो यह एक यौवन है 
तड़प रहा है जल बिन मछली की भाँति
अभीप्सा, आकांक्षा ,कल्पनाओं की ज्योति 
बसी हुई है उसके नैनों में ,
जामुन के बाग़ में 
सावन के झूलों पर 
झूल रही है तड़प ,
अंततः समझ ही ली 
यौवन की बेचैनी 
प्रीतम ने /

देखो यह एक चूड़ी है 
जिसका 
हो रहा है तालाब में 
जल की सतह पर 
प्रतिपल विस्तार, 

बूँदें बढीं 
चूड़ियाँ भी बढीं,
कुछ लेखनियाँ
जो अब तक बैठी थीं चुपचाप 
चल पडीं,
देखो यह एक चूड़ी है 
जो काट रही है 
दूसरी चूड़ी को ,
देखो यह...  ...कट रही है 
दूसरी से ,
देखो ये...काट रही हैं 
एक दूसरे को ,
देखो ये .. काट या कट नहीं रहीं 
विलीन हो रही हैं 
एक दूसरे में 
जल की सतह पर ही ,
अंततः समझ ही ली 
चूड़ियों की बेचैनी 
बूंदों  ने /

देखो यह मैं हूँ 
जो खोज नहीं रही 
कुछ भी नया ,
उगल रही हूँ कागज़ पर 
वही जो देख रही हूँ ,
यह नया है ना ,
उस दृष्टि के लिए लिए 
जो इधर नहीं पडी,

अंततः समझ ही ली 
इस कलम की बेचैनी 
इन हाथों ने /