Sunday, January 3, 2021

तमसो मा ज्योतिर्गमय

जाते हुए समय का साक्षी होना नव है
लेकर गहरी साँस, छोड़ देना भी नव है

चिरकालीन तिमिर से आच्छादित यदि नभ है
त्रास, वेदनापूर्ण स्वत्व, मूलक यदि भव है 
सिसिफ़स* कारागार उषा से निशा कालक्रम
चंद्रज्योति संग उषा रश्मि की इच्छा नव है

विधना से विधना, उस से कुछ ऊपर कब है
अंगीकार 'आमोर फैटी'** को करना जब है
संतापों को आत्मप्रवंचन के अलाव पर 
चढ़ा, दीप्ति को और बढ़ाना, उपक्रम नव है

तृण से सृजन समागम, हारिल का कलरव है
इसी समागम में निष्कामी का वैभव है
कथन, श्रवण, लेखन कल कल नित धारा बहती
यदि कर दे अनुभूति कर्म को प्रेरित, नव है

*Sisyphus
**Amor fati

Sunday, September 24, 2017

मुंसिफ़

मुझे आज़ाद करने में तू खुद को तोड़ता क्यूँ है;
मेरी तासीर तो तेरे लहू में रच बसी है। 

यूँ कर के क़ैद, मेलों में मुझे फिर ढूंढ़ता है;
बता ऐ पीर कैसी ये तेरी चारागरी है।  

मेरे होने से मालिक तू अगर होता कज़ा का;
तू ज़िंदा रह मेरे मुंसिफ़, कज़ा तो चल बसी है।  

हमारे हाल पर ये पिघलना है कहक़शाँ का;
न छू शबनम को उसमें, यूँ कि, गरमाहट बची है।  

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तासीर-Effect/impression
क़ज़ा-Death
चारागर -Doctor
मुंसिफ़ - Judge
कहक़शाँ -Galaxy
शबनम -  Dew


Monday, December 5, 2016

टर्र र ..टर्र र

नभ का इतना विस्तार
आस करता पंछी के आने की,  
इठलाना कब का छूट गया 
अब चाह मिलन पा जाने की।  


देखो मुझमे सूरज अनेक 
चंदा अनेक, तारे अनेक, 
विस्तार प्राप्त करतीं मुझमे 
टेढ़ी मेड़ी लहरें अनेक।  

मैं हूँ जगती की आस, प्यास 
जीवन की अविरल धारा हूँ ,
कॉलम हैं खिंचे हुए सबके 
दुश्मन हूँ, किसी का प्यारा हूँ।  

कुछ को न बोध मेरा, कुछ में
क्षमता न बोध पा जाने की,
इन आधारों पर श्रेष्ठ और 
निम्नता नृत्य कर लेती है,
मेरा स्वरूप यह भी तो है 
मैं दोनों का ही मारा हूँ।  

जब तक यह कलम, दृष्टि, मैं हूँ,
कुछ क्रम होंगे,
कुछ भ्रम होंगे, 
अधिकार मूर्खता का भी है, 
हम नरम सभी के प्रति होंगे।  

कुँए के मेंढक
टर्र र टर्र र कर लो 
पत्थर नहीं फेंकूँगा,
संगीत जान कर इसको भी 
पुष्पों तक मैं पहुंचा दूंगा।  

पुष्प..पुष्प है,   टर्र र ..टर्र र है, 
लहर..लहर, नहीं चाँद सूर्य है।  

पश्चिम स्वर्ण, पूर्व है चांदी।  
दो पंखों की मेरी कहानी।  

Thursday, March 31, 2016

मुझे कहाँ जाना है!?


चौबीस गुणे सात,
झड़ने लगे हैं पात, 

समय पर वो उग आये थे,
संघर्ष छूट, मिटटी का 
उनको आलिंगन पाना है,

मुझे कहाँ जाना है! 

एक स्वरुप, 
विचार एक, 
किन्तु खिंची रेखों पे रेख, 
परिवर्तित होकर उनको
खांचों में ढल जाना,

मुझे कहाँ जाना है!

तुम टूटे, 
मैं भी टूटूंगा,
तुम लूटे जो 
रस, लूटूँगा..

कहो सखे, कब सावन आये ?
सोच-सोच मेरा मन हर्षाये.. 

मन को भीग भीग जाना है, 
यह कोई स्वप्न या बहाना है!?

तब तक..
मुझे कहाँ जाना है!? 

Friday, February 5, 2016

तूफान शुकूं का


तूफान शुकूं का ढलता है,
तो दूर किनारा लगता है। 

वह पोत गया अहसासों को
गलियारों में, दीवारों पर;
अधमरे फूल, खिलती कलियाँ, 
खुशबू से भरी हुई गलियाँ,
सब चलें साथ ज़िद करती हैं,
पर निष्ठुरता से डरती हैं।  

"मत डरो तुम्हारा हि हूँ मैं" कह
रोज़ मनाने आता हूँ।  
रत्ती-रत्ती रंग इन सब से, 
मैं रोज़ चुरा ले जाता हूँ।  

अहसास,भाव
और अंश शुकूं के
नत्थी कर के जाता हूँ।  




Thursday, April 30, 2015

!!Honour Killing

यूँ बहते-बहते ही 
आती है, गले लग जाती है

संवेदना वह प्रेयसी है
जो इक नयी कहानी 
हर बार सुनाती है।  

इसकी कहानियाँ 
इक तिलिस्मी व्यापार,
ले जाती हैं उस पार,

टीवी पर बता रहे थे एक ज्ञानी 
"मत जाना उधर,
जंगली जानवर और भूत ही
कर सकते हैं राज वहां,

वहां से पिटकर आओगे 
यहाँ फालतू में ही अपनी 
किरकिरी करवाओगे।  

मत पड़ो इस चक्कर में भईया,
फादर श्री भविष्य सिंह 
मार देंगे गोली आप को 
रोज़ तेल पिलाते हैं 
अपनी दुनाली को।  

बच गए उनसे तो 
बन जाओगे धोबी के कुत्ते।  

!! वैसे जितनी आप की उम्र है 
उतना तो हमारा अनुभव ही है.. 
बचाने और इलाज करने का
आप जैसे बेसहारा नवयुवकों का।  

आप की स्क्रीन पर हमारे फ़ोन नम्बर्स मौजूद हैं। "

Monday, December 22, 2014

खुद को गढती नज़्म


                                                    (Rishikesh-  Dec.'14)            



यूं मुड़ मुड़ के देखा कई बार तो,
आदतों की ग़ुलामी भी बढ़ती गयी.
ग़र जो देखा कभी आमने-सामने,
आँखें ग़ुस्ताख़, नज़्में सी पढ़ती गयीं।


ये जो भेजी अंधेरों ने सौग़ात कल,
रात भर, नज़्म सर्दी सिकुड़ती रही.
सुबह सूरज मिले या कुहासा मिले,
इसकी मज़बूरी है, रात कटती रही। 

हम पढ़ेंगे इसे सुबह दिल खोलकर,
ग़र कहें; नज़्म बोलेगी छोड़ो मुझे.
इन खयालों का संगम हुआ इस कदर,
कंटकों से कली लड़-झगड़ती रही। 
                                                                                         
धुंध-अँधेरे की जो अपनी है आबरू ,
वो बचाये उसे या समंदर बने.
नज़्म निष्ठुर, समंदर बनाकर इसे,

दूर सबको किया, खुद को गढ़ती गयी।