जाते हुए समय का साक्षी होना नव है
लेकर गहरी साँस, छोड़ देना भी नव है
चिरकालीन तिमिर से आच्छादित यदि नभ है
त्रास, वेदनापूर्ण स्वत्व, मूलक यदि भव है
सिसिफ़स* कारागार उषा से निशा कालक्रम
चंद्रज्योति संग उषा रश्मि की इच्छा नव है
विधना से विधना, उस से कुछ ऊपर कब है
अंगीकार 'आमोर फैटी'** को करना जब है
संतापों को आत्मप्रवंचन के अलाव पर
चढ़ा, दीप्ति को और बढ़ाना, उपक्रम नव है
तृण से सृजन समागम, हारिल का कलरव है
इसी समागम में निष्कामी का वैभव है
कथन, श्रवण, लेखन कल कल नित धारा बहती
यदि कर दे अनुभूति कर्म को प्रेरित, नव है
*Sisyphus
**Amor fati
