तूफान शुकूं का ढलता है,
तो दूर किनारा लगता है।
वह पोत गया अहसासों को
गलियारों में, दीवारों पर;
अधमरे फूल, खिलती कलियाँ,
खुशबू से भरी हुई गलियाँ,
सब चलें साथ ज़िद करती हैं,
पर निष्ठुरता से डरती हैं।
"मत डरो तुम्हारा हि हूँ मैं" कह
रोज़ मनाने आता हूँ।
रत्ती-रत्ती रंग इन सब से,
मैं रोज़ चुरा ले जाता हूँ।
अहसास,भाव
और अंश शुकूं के
नत्थी कर के जाता हूँ।
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