Thursday, March 31, 2016

मुझे कहाँ जाना है!?


चौबीस गुणे सात,
झड़ने लगे हैं पात, 

समय पर वो उग आये थे,
संघर्ष छूट, मिटटी का 
उनको आलिंगन पाना है,

मुझे कहाँ जाना है! 

एक स्वरुप, 
विचार एक, 
किन्तु खिंची रेखों पे रेख, 
परिवर्तित होकर उनको
खांचों में ढल जाना,

मुझे कहाँ जाना है!

तुम टूटे, 
मैं भी टूटूंगा,
तुम लूटे जो 
रस, लूटूँगा..

कहो सखे, कब सावन आये ?
सोच-सोच मेरा मन हर्षाये.. 

मन को भीग भीग जाना है, 
यह कोई स्वप्न या बहाना है!?

तब तक..
मुझे कहाँ जाना है!? 

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