(Rishikesh- Dec.'14)
यूं मुड़ मुड़ के देखा कई बार तो,
आदतों की ग़ुलामी भी बढ़ती गयी.
ग़र जो देखा कभी आमने-सामने,
आँखें ग़ुस्ताख़, नज़्में सी पढ़ती गयीं।
ये जो भेजी अंधेरों ने सौग़ात कल,
रात भर, नज़्म सर्दी सिकुड़ती रही.
सुबह सूरज मिले या कुहासा मिले,
इसकी मज़बूरी है, रात कटती रही।
हम पढ़ेंगे इसे सुबह दिल खोलकर,
ग़र कहें; नज़्म बोलेगी छोड़ो मुझे.
इन खयालों का संगम हुआ इस कदर,
कंटकों से कली लड़-झगड़ती रही।
धुंध-अँधेरे की जो अपनी है आबरू ,
वो बचाये उसे या समंदर बने.
नज़्म निष्ठुर, समंदर बनाकर इसे,
दूर सबको किया, खुद को गढ़ती गयी।

Bahut umdaa! Badhai ho blog ki!
ReplyDelete