Tuesday, January 25, 2011

मेरा दिमाग क्यूँ खा रहा है

तो तुम ये कहना चाहते हो ..
रास्ता वही है जो तुम्हारे लिए रास्ता है ..
और वही रास्ता इस दुनिया के लिए है..
यहाँ लोग सत्ता के लिए
कर रहे हैं
खून पे खून ,
किसी को है अहिंसावादी
बनने का जुनून,
कोई रोटी बना रहा है ,
कोई खा रहा है ,
कोई खिला रहा है ,
और कोई ,जिनके पास रोटी नहीं है ..
उनको रोटी दिखा रहा है ,
कोई अपनी फटी पतलून को देख के शरमा रहा है.
और हाँ ..
हाँ ..
वो देखो कोई
मजदूरों पर गाडी चढ़ा रहा है ..
कोई उनको बचा रहा है
किसको ?..
अरे भाई कोई मजदूर को ,
तो कोई गाडी वाले को..

क्या ?..
क्या..
तेरी समझ मैं कुछ भी नहीं आ रहा है ...
:हाँ भाई मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है .....
तो खुद देख,
बाहर निकल कर,
अपने अंधकारमय ,
राजमहल से ..

मेरा दिमाग क्यूँ खा रहा है...

छाती मैं दर्द था कल

हाँ नही था कोई ...
जिसने कहा हो मुझसे ...
कि करो इस तरह से ..
या इस तरह से नहीं ..

था जानता नहीं मैं ,
कब तक कहूँगा खुद से ,
चुनता रहा हमेशा,
उपलब्ध थे जो मुझको,
विचार कुछ अनोखे /

अब होश आ रहा है ,
हाँ ..नशा हट रहा है ...
होता गया यूं ही...
अब कष्ट दे रहा है..
ना ....
ये कष्ट तो नहीं है ..
अनुभूति है अलग सी,
अनुभूति कहूं इसको ..
या नशा कुछ अलग सा

वो दोष खुद को दे तो,
तौहीन है हमारी
छाती मैं दर्द था कल
अब तक वो चल रहा है.
विचार एक नूतन
चुपके निकल रहा है/

उस दर्द के सहारे,
उस दर्द के सहारे..

Monday, January 24, 2011

कौन बनेगा करोडपती

और उस एक सवाल ने
कर दिया चिंतित मुझे,
क्या दोष दूँ .
उस सवाल करने वाले को ?
या उस माध्यम को
जिसकी वजह से सवाल पैदा हुआ है ..
या फिर स्वयं को,
उस माध्यम से जुड़ा होने के लिए ?
सवाल करने वाले को ,
या फिर उसके उस माध्यम से जुड़े होने को ?

दोष चिंता का भी हो सकता है जो अचानक से टूट पडी /

"उसको हटा दो,
खुद हट जाओ ,
या फिर माध्यम ही नही रहने दो ......"
ऐसे कुछ विकल्प आये तो थे

तो महोदय ये कोई खेल भी नहीं है ..
कौन बनेगा करोडपती का...
कि इनाम एक सही उत्तर पर मिलेगा...
अपना तो बीमा भी नहीं है /

सवाल चारों दिशाओं में
घूम रहे हैं
ग्रहों की तरह ...
जवाबों की रोशनी
उन पर पड़ कर दिन और रात का भेद पैदा कर रही है ...

तो सूर्य पूर्व में निकलता है ....यह एक जवाब है ..?

Friday, January 21, 2011

वो हल्की रेशमी ...


ये झोंपड़ी सावन में
सामना नहीं करती
ऊपर से आ रहे पानी का ..

जाड़ा और गरमी भी तो झांक कर जाते हैं उसके घर ,
जब भी उन को मौका मिलता है .

पर आज ना कुहरा है ..
ना पानी बरस रहा है ,
सुबह की हल्की रेशमी किरण आ रही है उसकी बिछावन पर ...
फटे हुए छप्पर कि अनुमति से ..

औ फिर बैठ गयी सिरहाने ...बोली..
यही समय है ..
उनको घर बुलाने का ...
फिर क्या था ...
लाल मिट्टी ..परात भर
और गोबर...
चौका हुआ ..खाना बना
और होने लगा इंतज़ार ....

वो आये या नहीं इसको छोडिये

पर आज उनके लिए ये सब हुआ..बस ये सोचिये ..
ऐसा नहीं है कि इंतज़ार पहले नहीं हुआ ...
सावन कि टपकती बूंदों , सर्दी मैं ठिठुरते कम्बल से पूछो ...

तो फिर आज क्या ख़ास था ?
..आज ?..
आज वो सुबह की हल्की रेशमी किरण...
गलती उसी की है ...

Thursday, January 20, 2011

जल रहे हैं

चलना तो पड़ा हमें..
अब भी चल रहे हैं
कहीं आशा के दीप ..
तोह कहीं दिल जल रहे हैं ....

इनको तो जलना ही था ..
सो जल पड़े ...
ज़माने को जाके बताये कोई ...
कि इन से ज्यादा तो हम जल रहे हैं ....

ये हवाओं के झोकों को ,
समझाओ भाई ...
आज कुछ ज्यादा ही ..
झूमे चल रहे हैं ...

बताओ इन्हें ,थी अभी आग बाकी...
आने से इनके सुलगने लगे हैं ...

"यूँ सुलगा के जाओ ना ..
जाना है तो आओ ना .."

ऐसा कभी भी मैं कह ना सकूँगा ..
हवा के झोके हो ,
जानता हूँ ...
तो फिर क्यूँ कहूँगा...
..
कैसे रहेंगे तुम बिन अभ्यास कर रहे हैं...
अभ्यास मैं हमारे क्यूँ आप जल रहे हैं?...

आभास हो गया और अभी हो गया है ...
आभास है तुम्हारा, अनुभूति है तुम्हारी,

अनुभूति के सहारे अब राह चल रहे हैं ,
ना तुम जल रहे हो , ना हम जल रहे हैं./

Tuesday, January 18, 2011

सवाल मुझ से मत करो


मेरे जाने के बाद क्या मिलेगा उस जगह पर,
सवाल ये मुझ से नहीं उस जगह से करना./
अगर कुछ ना मिले वहां पर तो
फिर ये हाल ज़माने से मत कहना /

क्यूँ कि मुझे तो भय नहीं है ज़माने का,
नहीं मुझे शौक है किसी बहाने का /

फंसा देंगे तुमको ,ये लोग निर्दयी हैं..
ये बात दूसरी है , ये गलत या सही हैं /
हो तुम भी वहीं और हम भी वहीं हैं .....

फिर ...फिर ...

ये बात मेरे जाने की कैसे उठी है ..
अब उठ तो गयी ...
चाहे जैसे उठी है...
... सवाल ये मुझ से नहीं उस जगह से करना.

क्यूँ कि हम भी वहीं हैं और तुम भी वहीं हो ...
पर हम दोनों ...
वहां नहीं हैं ..
जहां पहले थे ....

पहले हम कहाँ थे ...सवाल ये मुझ से नहीं उस जगह से करना....

Monday, January 17, 2011

भ्रम या वास्तविकता

ये राहें कहीं भ्रम तो नहीं ,
ये आहें कहीं भ्रम तो नहीं ,
ये बाहें भी कहीं भ्रम तो नहीं ?

या फिर सच यही हैं ,
भ्रम लगता है क्यूँ कि मैं भ्रम में हूँ /

पर ये भ्रम क्या चीज है जी ?

जला दूँ सबको तो जलेगा क्या,
भ्रम या वास्तविकता?
पर यह तो...
वास्तविकता के जलने के बाद भी,
नहीं पता चलेगा ...
क्यूँ कि भ्रम तब भी बचा रहेगा...

तो अब क्या ?
क्या सत्ता सापेक्षता की है..
यदि हाँ तो भ्रम और वास्तविकता हैं कहाँ ?

दूर ..दूर ...दूर .... सापेक्ष हि सापेक्ष है....
न भ्रम , न वास्तविकता ....