Monday, December 22, 2014

खुद को गढती नज़्म


                                                    (Rishikesh-  Dec.'14)            



यूं मुड़ मुड़ के देखा कई बार तो,
आदतों की ग़ुलामी भी बढ़ती गयी.
ग़र जो देखा कभी आमने-सामने,
आँखें ग़ुस्ताख़, नज़्में सी पढ़ती गयीं।


ये जो भेजी अंधेरों ने सौग़ात कल,
रात भर, नज़्म सर्दी सिकुड़ती रही.
सुबह सूरज मिले या कुहासा मिले,
इसकी मज़बूरी है, रात कटती रही। 

हम पढ़ेंगे इसे सुबह दिल खोलकर,
ग़र कहें; नज़्म बोलेगी छोड़ो मुझे.
इन खयालों का संगम हुआ इस कदर,
कंटकों से कली लड़-झगड़ती रही। 
                                                                                         
धुंध-अँधेरे की जो अपनी है आबरू ,
वो बचाये उसे या समंदर बने.
नज़्म निष्ठुर, समंदर बनाकर इसे,

दूर सबको किया, खुद को गढ़ती गयी।




Wednesday, August 6, 2014

कालीन

वादों और विवादों की यादों की भादों,
कृष्ण-पक्ष की नदी पर तैरते हुए चिरागों,
सूखते हुए तिलिस्मी झरनों की फरियादों,
महसूस करने की तड़प की रियाज़ों,
एक दूसरे से लगातार, ऊपर उठती हुई आवाज़ों,

के 

चौराहों के किनारों पर बैठकर,
ज़िन्दगी को देखती, ज़िन्दगी को देखकर,
दबे पांवों से, किनारों पर जा, उससे भेंटकर,
भेंट कर धागे, जुलाहे से जो लाया तोड़कर,
बुन कोई कालीन अब इस प्रेयसी से मेलकर।  



Friday, March 28, 2014

कविता, तुम तो स्वतंत्र हो.....



हुआ यूँ कि,
सुनकर संगीत में लहरों का स्वर,
तुमको आते देखा,

किनारों तक पहुंचकर,
धड़ाम से.... 

ले जाते देखा,
कागज़ की नाव को,
खाली बोतलों, डब्बों और कचरे के साथ।  

उस नाव के कागज़ पर 
उकेरा था उस धुंधली शाम को,
साथ ही तुम्हारे विस्तार, लहर और आवाज़ को,
किसी हड़बड़ाती कलम ने,
स्पष्टता का दम्भ भरते-भरते। 



दंभ तो वह शिला है
जो पड़ी हुई है तुम्हारे किनारे पर 
सदियों से,
गाते हुए स्पष्टता के गीत;

इससे दूर होते होते 
फैलता जाता है तुम्हारा असीमित विस्तार,
आश्वस्त करते हुए 
कि 
एक धुंधली शाम की कहानी लिए 
एक हो गयी है तुम में,
वह कागज़ की नाव।  


किन्तु,
ना जाने क्यूँ
प्रिय है कम्बख्त कवि को,
यह शिला ! 

खैर !
कविता, तुम तो स्वतंत्र हो.....