बाहर तपते हुए सूरज के ख़याल से,
जो अठखेलियाँ अन्दर शुरू हुईं,
पहुँचा दिया उन्होंने,
आसानी से
गोधुली तक.
अब घण्टियाँ तो नहीं,
पर हाँ..
घर लौटते पंछी,
सूचक बन गए हैं इस समय के.
कोई चित्रकार होता,
तो संघर्ष करने लग जाता
धीरे-धीरे पैर पसार रहे अँधेरे से.
पर वह
आनंदित होता है,
मस्तिष्क में अंकित होते देख,
इन अविश्मरणीय चित्रों को,
जिन्हें,
बना रहे हैं
घर लौटते हुए चित्रकार.
कभी भेंट हो जाती है इनसे,
कभी भेंट हो जाती है इनसे,
जब ये रश्मि की दोस्ती
और स्याही निचोड़ कर
सूरज की शीतलता से ,
बना रहे होते हैं
एक भिन्न चित्र.
एक दिन वह
अपने घर की बैल्कनी में नहीं आया,
पर चित्रकारों ने चित्र बनाया!

Dusk and sunset have been perfectly captured in your words. I've felt this very often, this idea, this sensibility, the feeling that dusk in some way is its own time, and I am an observer of it, and that feeling, of evening, of the colours and sounds of it, always make me feel very free, each moving image seems so specially coloured. I felt dusk as I read the poem.
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