Sunday, May 31, 2009

अधूरी अलविदा

तीर सी लगतीं मुझे अब ये हवायें,
रास आती हैं नहीं काली घटाएं ।

पंछियों की चहक कर्कश लग रही है ,
और खुशबू चित्त मैला कर रही है ।

पंखुड़ी कोमल कमल की नहीं लगती,
काटने को दौड़ती यह छांव लगती ।

नदी तट मुझको नहीं अब हर्ष देता,
जल नहीं मुझको नरम स्पर्श देता ।

प्रिय नहीं लगती मुझे कोई कली अब,
मधुप भी लगता मुझे कोई छली अब ।

काननों में मधुर वंशी नहीं बजती ,
अब नदी पर रश्मि डोली नहीं सजती ।

ज़िन्दगी में है अधूरापन समाया,
कहूं कैसे मीत ने मुझको सताया ।

गिरा दे मुझको झटक चुनरी अदा से ,
बेहतर होगा,अधूरी अलविदा से ।

4 comments:

  1. hey its amazing and shows profundity in ur thoughts. u seems to b professional poet. keep rockg :)

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  2. thank u very much vinod n akansha...
    @akansha... i really appreciate comprehension...thanx..

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  3. यह कविता मुझे इसलिए पसंद आयी कि इसमें एक बहाव है, भावों का भी और पंक्तियों का भी ।सच है कि मीत की अधूरी अलविदा से मन और दुखित हो जाता है , इससे तो यही बेहतर है कि उससे एक ही बार सम्बन्ध-विच्छेद हो जाए। पढ़कर मज़ा आया और सोचा कि आपसे पूछूं कि आपका भी कोई मीत था क्या? माजरा क्या हुआ?

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