तीर सी लगतीं मुझे अब ये हवायें,
रास आती हैं नहीं काली घटाएं ।
पंछियों की चहक कर्कश लग रही है ,
और खुशबू चित्त मैला कर रही है ।
पंखुड़ी कोमल कमल की नहीं लगती,
काटने को दौड़ती यह छांव लगती ।
नदी तट मुझको नहीं अब हर्ष देता,
जल नहीं मुझको नरम स्पर्श देता ।
प्रिय नहीं लगती मुझे कोई कली अब,
मधुप भी लगता मुझे कोई छली अब ।
काननों में मधुर वंशी नहीं बजती ,
अब नदी पर रश्मि डोली नहीं सजती ।
ज़िन्दगी में है अधूरापन समाया,
कहूं कैसे मीत ने मुझको सताया ।
गिरा दे मुझको झटक चुनरी अदा से ,
बेहतर होगा,अधूरी अलविदा से ।
रास आती हैं नहीं काली घटाएं ।
पंछियों की चहक कर्कश लग रही है ,
और खुशबू चित्त मैला कर रही है ।
पंखुड़ी कोमल कमल की नहीं लगती,
काटने को दौड़ती यह छांव लगती ।
नदी तट मुझको नहीं अब हर्ष देता,
जल नहीं मुझको नरम स्पर्श देता ।
प्रिय नहीं लगती मुझे कोई कली अब,
मधुप भी लगता मुझे कोई छली अब ।
काननों में मधुर वंशी नहीं बजती ,
अब नदी पर रश्मि डोली नहीं सजती ।
ज़िन्दगी में है अधूरापन समाया,
कहूं कैसे मीत ने मुझको सताया ।
गिरा दे मुझको झटक चुनरी अदा से ,
बेहतर होगा,अधूरी अलविदा से ।