Sunday, May 31, 2009

अधूरी अलविदा

तीर सी लगतीं मुझे अब ये हवायें,
रास आती हैं नहीं काली घटाएं ।

पंछियों की चहक कर्कश लग रही है ,
और खुशबू चित्त मैला कर रही है ।

पंखुड़ी कोमल कमल की नहीं लगती,
काटने को दौड़ती यह छांव लगती ।

नदी तट मुझको नहीं अब हर्ष देता,
जल नहीं मुझको नरम स्पर्श देता ।

प्रिय नहीं लगती मुझे कोई कली अब,
मधुप भी लगता मुझे कोई छली अब ।

काननों में मधुर वंशी नहीं बजती ,
अब नदी पर रश्मि डोली नहीं सजती ।

ज़िन्दगी में है अधूरापन समाया,
कहूं कैसे मीत ने मुझको सताया ।

गिरा दे मुझको झटक चुनरी अदा से ,
बेहतर होगा,अधूरी अलविदा से ।