Monday, December 5, 2016

टर्र र ..टर्र र

नभ का इतना विस्तार
आस करता पंछी के आने की,  
इठलाना कब का छूट गया 
अब चाह मिलन पा जाने की।  


देखो मुझमे सूरज अनेक 
चंदा अनेक, तारे अनेक, 
विस्तार प्राप्त करतीं मुझमे 
टेढ़ी मेड़ी लहरें अनेक।  

मैं हूँ जगती की आस, प्यास 
जीवन की अविरल धारा हूँ ,
कॉलम हैं खिंचे हुए सबके 
दुश्मन हूँ, किसी का प्यारा हूँ।  

कुछ को न बोध मेरा, कुछ में
क्षमता न बोध पा जाने की,
इन आधारों पर श्रेष्ठ और 
निम्नता नृत्य कर लेती है,
मेरा स्वरूप यह भी तो है 
मैं दोनों का ही मारा हूँ।  

जब तक यह कलम, दृष्टि, मैं हूँ,
कुछ क्रम होंगे,
कुछ भ्रम होंगे, 
अधिकार मूर्खता का भी है, 
हम नरम सभी के प्रति होंगे।  

कुँए के मेंढक
टर्र र टर्र र कर लो 
पत्थर नहीं फेंकूँगा,
संगीत जान कर इसको भी 
पुष्पों तक मैं पहुंचा दूंगा।  

पुष्प..पुष्प है,   टर्र र ..टर्र र है, 
लहर..लहर, नहीं चाँद सूर्य है।  

पश्चिम स्वर्ण, पूर्व है चांदी।  
दो पंखों की मेरी कहानी।