वादों और विवादों की यादों की भादों,
कृष्ण-पक्ष की नदी पर तैरते हुए चिरागों,
सूखते हुए तिलिस्मी झरनों की फरियादों,
महसूस करने की तड़प की रियाज़ों,
एक दूसरे से लगातार, ऊपर उठती हुई आवाज़ों,
कृष्ण-पक्ष की नदी पर तैरते हुए चिरागों,
सूखते हुए तिलिस्मी झरनों की फरियादों,
महसूस करने की तड़प की रियाज़ों,
एक दूसरे से लगातार, ऊपर उठती हुई आवाज़ों,
के
चौराहों के किनारों पर बैठकर,
ज़िन्दगी को देखती, ज़िन्दगी को देखकर,
दबे पांवों से, किनारों पर जा, उससे भेंटकर,
भेंट कर धागे, जुलाहे से जो लाया तोड़कर,
बुन कोई कालीन अब इस प्रेयसी से मेलकर।