हुआ यूँ कि,
सुनकर संगीत में लहरों का स्वर,
तुमको आते देखा,
किनारों तक पहुंचकर,
धड़ाम से....
ले जाते देखा,
कागज़ की नाव को,
खाली बोतलों, डब्बों और कचरे के साथ।
उस नाव के कागज़ पर
उकेरा था उस धुंधली शाम को,
साथ ही तुम्हारे विस्तार, लहर और आवाज़ को,
किसी हड़बड़ाती कलम ने,
स्पष्टता का दम्भ भरते-भरते।
दंभ तो वह शिला है
जो पड़ी हुई है तुम्हारे किनारे पर
सदियों से,
गाते हुए स्पष्टता के गीत;
इससे दूर होते होते
फैलता जाता है तुम्हारा असीमित विस्तार,
आश्वस्त करते हुए
कि
एक धुंधली शाम की कहानी लिए
एक हो गयी है तुम में,
वह कागज़ की नाव।
किन्तु,
ना जाने क्यूँ
प्रिय है कम्बख्त कवि को,
यह शिला !
खैर !
कविता, तुम तो स्वतंत्र हो.....
