झलक भर देखा,
पलक, भरभरा के झुकाया,
तुम्हारी दहाड़ती लहरों ने कहा बड़े प्यार से,
"बड़े दिन बाद ली है खबर मेरी!
आँखें खोलोगे तो चला जाऊँगा,
बंद रखो आँखे थोड़ी देर,
क्यूंकि इन बंद आँखों के साए में,
मेरी लहरें,
खोजती हैं खुद को!"
आँखें बंद हो जाती हैं खुद ही,
जब भी मिलती है तुम्हारी एक झलक,
तुम्हारे किनारे पर बिछी सतरंगी बालू का रक्तिम सूर्य-किरणों से मिलन,
ये लो.. खोज लिया लहरों ने खुद को,
इस बालू तक पहुँच कर दम तोड़ते हुए,
दम नहीं तोडा!
..यह लहरों का बनना,
किनारों पर घरोंदों का उगना,
अस्त होते सूरज का सतरंगी बालू से मिलना,
ये लो..लहर ने बना दिया इसे त्रिवेणी,
विलुप्त और नूतन सृजन के बीच जो किनारा है
पल पल बदलता है वह इस किनारे पर,
जब कभी में चलता हूँ इस पर नंगे पाँव,
यह स्वरुप है इस पल का,
गुदगुदा रहा तलवों को,
काश थोड़े और कोमल होते...