एक सुबह,
चहक, हलचल,
धुंध में सनी हुई
रक्तिम प्रकृति को चीर कर
दूर क्षितिज से चल कर
पहुंची,
एक सुबह,
दोपहर तक।
ऊपर देखा,
सूरज हंस रहा था,
इस विलंबित सुबह को देखकर,
जो कह रही थी कहानी,
हया, धुंध,और कुम्हलाने वाली गर्माहट की।
दिन और रात के बीच उसका पता है,
सबको पता है,
शायद सूरज भी इसलिए हंस रहा है।
देखा तो मद्धम होने लगी
सूरज की हंसी
लगता है उसको कुछ काम है।
सर्द हवा ने कहा
फुसफुसा कर,कान में,
"लो वापस आ गयी सूरज की मुस्कराहट"
पर यह क्या!!
यह तो शाम है...