अंकुरित नूतन सिहरने
देह से मिलकर, थिरकने
गीत के आलय में रहने
चंद पल मेहमान बनके
आ गयीं तो बात क्या है...
गीत तो नूतन नहीं है
स्वेत चादर तो वही है
ओढ़ कर जिसको शिशिर में
धूप गीतों ने चखी है
गीत की अंगुली पकड़कर
छा गयीं तो बात क्या है...
धूप है कुछ गुनगुनी सी
यह कहानी है सुनी सी
उधड़ी कुछ है, कुछ बुनी सी
छेद देखा वस्त्र में
लेकर हथेली पर चुनी सी
चुराकर गरमी जरा
पहुंचा गयी तो बात क्या है...
ओठ माथे पर लगाकर
और थोडा मुस्कुराकर
शाम का दीया जलाकर
गीत,अवसर उचित पाकर
सिहरनों को गोद ले
उठ चल दिया तो बात क्या है...