Thursday, May 31, 2012

बिन कूँची के













बाहर तपते हुए सूरज के ख़याल से,
जो अठखेलियाँ अन्दर शुरू हुईं,
पहुँचा दिया उन्होंने,
आसानी से
गोधुली तक.

अब घण्टियाँ तो नहीं,
पर हाँ..
घर लौटते पंछी,
सूचक बन गए हैं इस समय के.

कोई चित्रकार होता,
तो संघर्ष करने लग जाता
धीरे-धीरे पैर पसार रहे अँधेरे से.

पर वह
आनंदित होता है,
मस्तिष्क में अंकित होते देख,
इन अविश्मरणीय चित्रों को,
जिन्हें,
बना रहे हैं 
घर लौटते हुए चित्रकार.


कभी भेंट हो जाती है इनसे,
जब ये रश्मि की दोस्ती
और स्याही निचोड़ कर
सूरज की शीतलता से ,
बना रहे होते हैं
एक भिन्न चित्र.

एक दिन वह
अपने घर की बैल्कनी में नहीं आया,
पर चित्रकारों ने चित्र बनाया!