Friday, April 13, 2012

चित्रावली

पृष्ठ पलटा,
चित्र दिखा,
एक और पृष्ठ,
एक और चित्र,

जितने पृष्ठ,
उतने चित्र.

कुछ चित्रों को बहुत नजदीक पाया..
अँगुलियों ने पृष्ठ पलटने में आलस जो दिखाया.

कुछ चित्र ऐसे भी दिखे
जिन्होंने अँगुलियों को आलसी बनाया.

अँगुलियों को वक़्त का ख़याल आया,
फुर्ती दिखाई,
स्मृतिपटल पर होने से पहले ही अंकित,
कुछ चित्रों को,
बिसराया.

अँगुलियों की गति धीमी हुई,
सीधा करने 
इस चित्र के 
मुड़े हुए कोने को ,
और ..पाकर उपयुक्त समय
झूल गए
कुछ पिछले चित्र!

कोना सीधा हुआ
"अरे! यह तो बड़ा 
मनोहर है!"
कहते हुए ,
कर दिया सामने,
अगला चित्र,
अँगुलियों ने.

तभी..

महसूस करती हैं,
बाएं हाथ की अंगुलिया,
कुछ खुरदरा,
इस चित्रावली के मुखपृष्ठ पर.

सामने था,
यह चिरपरिचित चित्र.....

एक पेड़
टहनी पर बैठा मोर 
पी रहा है पानी 
'कल्पना' के, ऊपर उठे हुए,
बाएं हाथ में रखी कटोरी से...

जब -जब कल्पना आती है,
हाथ ऊपर कर के पानी पिलाती है,
मोर होता है तृप्त 
उतरता है नीचे 
फैलाता है पंख 
करता है मनोहर नृत्य ....

पर जब आते हैं कल्पना के घोड़े,
समेटता है पंख 
चला जाता है प्रकृति की गोद में,
उड़ के,
निहाराता है उसका सौंदर्य....

और मैं निहारता हूँ 
इस चित्र को ..
अपलक
देर तलक .....