Tuesday, February 7, 2012

वक़्त की सतह पर!

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(photograph-Jan 2012,when i captured 'Pragya's experiments with sand') 

ना हँसता है 
ना रोता है 
ना पाता है 
ना खोता है 

कहीं चक्र 
तो कहीं 
रेखाओं में बसता है
हाँ यह वक़्त ही है 
जो 
बूँद बूँद रिसता है!
  
पिघलने,
बहने,
उड़ने
और बरसने में,
यह वक़्त ही है  
जो अन्तर पैदा करता है !

सूखने लगता है जब पानी,
वक़्त की सतह पर 
उभरे चेहरों में,
तो बाकी काम
कर देते हैं हवा के झोंके,
वक़्त की सतह पर!

पर वक़्त..
बूँद बूँद रिसता है.