Sunday, December 16, 2012

गोल्डन लाइन के पास




लेकर दो संतोष भरे कश
करा के अंगारे और धुंए का
सजीव मिलन 
सिगरेट के मुहाने पर,
झूल गया में भी कुर्सी पर 
करने कमर सीधी
ज़रा संतोष से।

सामने दिखा
उड़ता हुआ, बारीक सा...
 
वेग नहीं है, हवा है, कमरे के अन्दर 
झूल रहा है मतवाला हो 
यहाँ से वहां, फिर भी..

गति देने उसकी उन्मुक्तता को 
पहुचाया धुंआ जब उसतक,
तो,
नहीं दिखी उसकी स्वच्छंदता...
गायब कर दिया था उसे,
धुंए के वेग ने।

दर्शन और वियोग से परे 
सवाल प्रतीक्षा कर रहा है दृष्टि की
कि उनका क्या..जो दिखे नहीं 

किन्तु 

दृष्टि पड़ी,
अंगारे और धुंए की
निर्जीव होती सजीवता पर..

जहाँ, गोल्डन लाइन के निकट ही
फ़िल्टर भी दिख रहा है। 

Monday, November 19, 2012

गोद में सिहरन उठाकर


अंकुरित नूतन  सिहरने
देह से मिलकर, थिरकने
गीत के आलय में रहने
चंद पल मेहमान बनके
आ गयीं तो बात क्या है...

गीत तो नूतन नहीं है

स्वेत चादर तो वही है
ओढ़ कर जिसको शिशिर में
धूप गीतों ने चखी है
गीत की अंगुली पकड़कर
छा गयीं तो बात क्या है...

धूप है कुछ गुनगुनी सी

यह कहानी है सुनी सी
उधड़ी कुछ है, कुछ बुनी सी
छेद देखा वस्त्र में
लेकर हथेली पर चुनी सी
चुराकर गरमी जरा
पहुंचा गयी तो बात क्या है...

ओठ माथे पर लगाकर

और थोडा मुस्कुराकर
शाम का दीया जलाकर
गीत,अवसर उचित पाकर
सिहरनों को गोद ले
उठ चल दिया तो बात क्या है...

Saturday, August 25, 2012

A-जन-B



चलते हुए भी खड़े रहना,
खड़े-खड़े चलना बहुत तेज,
है प्रक्रिया या प्रतिक्रिया..
सतह जवाब दे सकती है.

सच?
तो फिर क्यों बैठे थे तल में,
पालती लगाये,
जहाँ प्रकाश को भी
करना पड़ता है संघर्ष
तुम तक पहुँचने के लिए.

अरे अरे...
बात तो सच है!

जवाब सतहें भी दे सकती हैं..
तो ले लो.

जाना मुझे भी सतह पर है,
पर सवालों से दूर कहीं,
बहना है लहरों के साथ..
जो मिटा देती हैं,
पैरों के निशान भी किनारों पर,
और बना देती हैं अजनबी.

शुक्रिया लहरों का
जो साथ देती हैं 
अजनबी बनने की तड़प का.

अजनबी नहीं है
अंजान शहर में
अजनबी होना.

Thursday, May 31, 2012

बिन कूँची के













बाहर तपते हुए सूरज के ख़याल से,
जो अठखेलियाँ अन्दर शुरू हुईं,
पहुँचा दिया उन्होंने,
आसानी से
गोधुली तक.

अब घण्टियाँ तो नहीं,
पर हाँ..
घर लौटते पंछी,
सूचक बन गए हैं इस समय के.

कोई चित्रकार होता,
तो संघर्ष करने लग जाता
धीरे-धीरे पैर पसार रहे अँधेरे से.

पर वह
आनंदित होता है,
मस्तिष्क में अंकित होते देख,
इन अविश्मरणीय चित्रों को,
जिन्हें,
बना रहे हैं 
घर लौटते हुए चित्रकार.


कभी भेंट हो जाती है इनसे,
जब ये रश्मि की दोस्ती
और स्याही निचोड़ कर
सूरज की शीतलता से ,
बना रहे होते हैं
एक भिन्न चित्र.

एक दिन वह
अपने घर की बैल्कनी में नहीं आया,
पर चित्रकारों ने चित्र बनाया! 

Friday, April 13, 2012

चित्रावली

पृष्ठ पलटा,
चित्र दिखा,
एक और पृष्ठ,
एक और चित्र,

जितने पृष्ठ,
उतने चित्र.

कुछ चित्रों को बहुत नजदीक पाया..
अँगुलियों ने पृष्ठ पलटने में आलस जो दिखाया.

कुछ चित्र ऐसे भी दिखे
जिन्होंने अँगुलियों को आलसी बनाया.

अँगुलियों को वक़्त का ख़याल आया,
फुर्ती दिखाई,
स्मृतिपटल पर होने से पहले ही अंकित,
कुछ चित्रों को,
बिसराया.

अँगुलियों की गति धीमी हुई,
सीधा करने 
इस चित्र के 
मुड़े हुए कोने को ,
और ..पाकर उपयुक्त समय
झूल गए
कुछ पिछले चित्र!

कोना सीधा हुआ
"अरे! यह तो बड़ा 
मनोहर है!"
कहते हुए ,
कर दिया सामने,
अगला चित्र,
अँगुलियों ने.

तभी..

महसूस करती हैं,
बाएं हाथ की अंगुलिया,
कुछ खुरदरा,
इस चित्रावली के मुखपृष्ठ पर.

सामने था,
यह चिरपरिचित चित्र.....

एक पेड़
टहनी पर बैठा मोर 
पी रहा है पानी 
'कल्पना' के, ऊपर उठे हुए,
बाएं हाथ में रखी कटोरी से...

जब -जब कल्पना आती है,
हाथ ऊपर कर के पानी पिलाती है,
मोर होता है तृप्त 
उतरता है नीचे 
फैलाता है पंख 
करता है मनोहर नृत्य ....

पर जब आते हैं कल्पना के घोड़े,
समेटता है पंख 
चला जाता है प्रकृति की गोद में,
उड़ के,
निहाराता है उसका सौंदर्य....

और मैं निहारता हूँ 
इस चित्र को ..
अपलक
देर तलक .....

Tuesday, February 7, 2012

वक़्त की सतह पर!

.

(photograph-Jan 2012,when i captured 'Pragya's experiments with sand') 

ना हँसता है 
ना रोता है 
ना पाता है 
ना खोता है 

कहीं चक्र 
तो कहीं 
रेखाओं में बसता है
हाँ यह वक़्त ही है 
जो 
बूँद बूँद रिसता है!
  
पिघलने,
बहने,
उड़ने
और बरसने में,
यह वक़्त ही है  
जो अन्तर पैदा करता है !

सूखने लगता है जब पानी,
वक़्त की सतह पर 
उभरे चेहरों में,
तो बाकी काम
कर देते हैं हवा के झोंके,
वक़्त की सतह पर!

पर वक़्त..
बूँद बूँद रिसता है.