करा के अंगारे और धुंए का
सजीव मिलन
सिगरेट के मुहाने पर,
झूल गया में भी कुर्सी पर
करने कमर सीधी
ज़रा संतोष से।
सामने दिखा
उड़ता हुआ, बारीक सा...
वेग नहीं है, हवा है, कमरे के अन्दर
झूल रहा है मतवाला हो
यहाँ से वहां, फिर भी..
गति देने उसकी उन्मुक्तता को
पहुचाया धुंआ जब उसतक,
तो,
नहीं दिखी उसकी स्वच्छंदता...
गायब कर दिया था उसे,
धुंए के वेग ने।
दर्शन और वियोग से परे
सवाल प्रतीक्षा कर रहा है दृष्टि की
कि उनका क्या..जो दिखे नहीं
किन्तु
दृष्टि पड़ी,
अंगारे और धुंए की
निर्जीव होती सजीवता पर..
जहाँ, गोल्डन लाइन के निकट ही
फ़िल्टर भी दिख रहा है।

