Friday, December 30, 2011

इन घुमावदार चौराहों ने


इन घुमावदार चौराहों ने 
धूल के थमने पर डामर बिछना,
बारिशों से डामर उखड़ना,
गिट्टियों को धंसाकर
फिर से  डामर बिछाने के प्रयत्न,
 अनेक बार देखे हैं ...

देखा है,
झुर्रियों में बदलती कसावट को 
खामोशियों में पैदा हुई आहट को,
एक तरफ भटकाव 
तो दूसरी तरफ 
पंथ मिलने से मिली राहत को,
इन घुमावदार चौराहों ने...

पर वहां देखो..
..कोई खड़ा है..
ओह ..एक जिज्ञासु..
गूँज रहे हैं कुछ शब्द,
खामोशी  में ...

पथिक हो
जानना है जितना  
उतना तो जान ही लोगे 
प्रयत्न उस से अधिक के लिए 
संभवतः व्यर्थ है!