चाँद में जो दिखता है
वह खरगोश है छोटा सा
संशय है उसके रंग पर
किन्तु वह दौड़ता है,
उछलता है ,
कूदता है ,
कल्पना के साम्राज्य में...
जहाँ न कोई तख्त है
ना कोई ताज..
उसको तो बस सुनाई पड़ती है
एक आवाज़..
जिसके स्रोत को खोजने की अपेक्षा
वह आभारी है ,
उन कानो का ,
जिन में पड़ रही है
वह आवाज़!