Wednesday, February 18, 2009

अनाघ्रातं पुष्पं

वो आपका सोते हुए को जगाना
फ़िर सामने बैठकर मुस्कुराना
देखने पर
नज़रें झुका के शर्माना
देखकर की व्यस्त हूँ
सुगंध कानन में बिखराते हुए चले जाना
मुझे तनाव में देखकर दबे पाँव आना
आंखों से आँखों को दूर कहीं ले जाना
नज़रों का पीछा कर के लजा जाना
और फ़िर धीरे से मुस्कुराना
मेरे हर काम में हाथ बंटाना
जब खुश हो जाऊं तो इतराना
देखा कि अब में निश्चिंत हूँ....वह कुसुम सा स्पर्श
और फ़िर चले जाना
शायद इसी
को कहते हैं सताना।
समझते हैं दोनों ही शायद ...
फ़िर भी पता नहीं
क्यूँ नहीं होता कह पाना ...

सुनों
इस बार जब आना
उषा की रश्मी बनकर छा जाना,
त्विषा बनकर ठहर जाना,
दिन भर कि वह थकान
शायद तुम्हारी चंचलता ले जाए
संभवतः सम्भव तभी हो पायेगा
वह कह पाना ,
वरना
लगा रहेगा
आपका आना जाना
और मेरा कविता लिखते जाना।


पर यह क्या कर रहा हूँ मैं ,
कली से अभी खिलने के लिए कह रहा हूँ मैं ,
भूलकर कि ग्रीष्म है
उसे कुम्हलाने से है बचाना
आजकल हवा तेज चलती हैं
प्रभंजन बनकर
उसे टूटने से भी तो है बचाना...

बचा पाया उसे
तो सुनिश्चित है
कली का स्वतः ही कुसुम बन जाना।