कल रात पूर्णिमा थी ,
चाँद सोने का हुआ
चांदी का हुआ,
नाचने लगा
प्रकाश
उस सुसज्जित पार्क के
अनदेखे कोने में
पडी हुई कुर्सी के
चारों ओर
जहाँ हलचल थी बंद आँखों की,
आँखें कम खुलीं
पर चेहरा खिल गया /
रौशनी जाने लगी
गहरी होने लगी छाँव और अँधेरे की दोस्ती,
कम होने लगे विकल्प
उन अधखुली आँखों के सामने,
आँखों के और शरीर के
आलसी संघर्ष का अंत किया
उस ठंडी हवा के झोके ने ,
कान भी बोलने लगे कि
यह पूर्णिमा है पतझड़ की /
चहुँ ओर फैला धवल प्रकाश
उड़ते पत्तों का महारास,
अर्धसुसुप्त घास
जिसको जगा दें ओष की बूँदें
ऐसी आस,
यह सब देखा उस कुर्सी ने
कल रात /
आज प्रतिपदा है /
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